ISHWARIY NYAY
Price: 7/-



Product Detail

Author Pt. shriram sharma
Descriptoin 1 विवाह यज्ञ है, इसे उद्धत उत्पात जैसा न बनाएँ :- Book 2 ईश्वरीय न्याय :- Book 3 दहेज दानव से सामाजिक लड़ाई लड़ी जाय :- Book 4 हारिए न हिम्मत :- Book 5 गृहस्थ जीवन एक तपोवन :- Book 6 उपासना के दो चरण जप और ध्यान :- Book 7 Chitra Round Sarvdharma (4*4) :- Sticker
Dimensions 12 cm x 18 cm
Language Hindi
PageLength 24
Preface गायत्री का पन्द्रहवाँ अक्षर “ म “ हमको ईश्वरीय न्याय के अनुकूल चलने की शिक्षा देता है – महेश्वरस्य विज्ञाय नियमां न्याय: संयुतान् । तस्य सत्तांच स्वीकुर्वन कर्मणा तमुपासते ।। अर्थात् - “परमात्मा की सत्ता और उसके न्यायपूर्ण नियमों को समझ कर ईश्वर की उपासना करनी चाहिए।" ईश्वर सर्वव्यापक, दयालु, सच्चिदानन्द, जगतपिता, न्यायकारी आदि अनेकों महिमाओं से युक्त हैं। उनका ध्यान रखने से मनुष्य का बुराइयों से बचना और दूसरों के साथ सद्व्यवहार करना अधिक संभव है। इसलिए ईश्वर में और उनके न्याय में विश्वास रखना मनुष्य और समाज के लिए परम कल्याणकारी है। ईश्वर की उपासना से मनुष्य का आत्मिक बल बढ़ता है और आत्मिक बल द्वारा नाना प्रकार के भौतिक सुख और आनन्द प्राप्त होते हैं। पर साथ ही यह भी ध्यान रखना चाहिए कि ईश्वर नियम अटल, अचल होते हैं और जो उनका उल्लंघन करता है उसे घोर दुष्परिणाम भुगतना पड़ता है। संसार में अधिकांश लोग मुख से इस बात को कहते हुए भी दिल से इस बात पर दृढ़ विश्वास नहीं रखते और तरह-तरह के पाप कर्मों में लीन हो जाते हैं। इसलिए अनगिनत लोग कष्ट भोगते दिखाई पड़ते हैं। परमात्मा और आत्मा का संबन्ध ठीक एक तराजू की तरह है। इसका एक पलड़ा न्याय का है और दूसरा नियम का। जीव जितना ही ईश्वर नियमों पर चलता है अथवा उन्हें तोड़ता है, उतनी ही तोल के अनुसार उसे अच्छा या बुरा कर्मफल मिलता है। जो लोग इस तत्व पर ध्यान न देकर संसार में अँधेरे का बोलवाला समझते हैं और तद्नुसार मनमाना आचरण करते हैं, वे ही घोर दुखों में फँसकर अपने जीवन को नष्ट कर डालते हैं।
Publication Yug nirman yojana press
Publisher Yug Nirman Yojana Vistara Trust
Size normal
TOC • कर्म फल कैसे मिलता है • सुख दुःख का उत्तरदायित्व • कर्म और उनसे होने वाले परिणाम • मनुष्य अपना निर्माता स्वयं है • दुःख का कारण पाप ही नहीं है
TOC 1 ईश्वर का विराट रुप 2 ब्रह्मज्ञान का प्रकाश 3 शक्ति का सदुपयोग 4 धन का सदुपयोग 5 आपत्तियों में धैर्य 6 नारी की महानता 7 गृहलक्ष्मी की प्रतिष्ठा 8 प्रकृति का अनुसरण 9 मानसिक संतुलन 10 सहयोग और सहिष्णुता 11 इंद्रिय संयम 12 परमार्थ और स्वार्थ का समन्वय 13 सर्वतोमुखी उन्नति 14 ईश्वरीय न्याय 15 विवेक की कसौटी 16 जीवन और मृत्यु 17 धर्म की सुदृढ़ धारणा 18 उदारता और दूरदर्शिता 19 स्वाध्याय और सत्संग 20 आत्म ज्ञान और आत्म कल्याण 21 पवित्र जीवन 22 प्राणघातक व्यसन 23 सावधानी और सुरक्षा 24 संतान के प्रति कर्तव्य 25 शिष्टाचार और सहयोग



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