घर के वातावरण में स्वर्ग का अवतरण

Author: Pt. Shriram Sharma Acharya

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Preface

भारतीय संस्कृति में पारिवारिक जीवन को एक उच्चस्तरीय योगाभ्यास कहा है ।। योग साधना का अर्थ है- अपने सीमित और संकुचित अहं को असीम और विराट चेतना से एकाकार कर देना ।। गृहस्थाश्रम सीमित से असीम की ओर अग्रसर होने के लिए क्रमश: आगे बढ़ने का अभ्यास करने के लिए ऋषि प्रणीत एक प्रयोगशाला है ।। प्राचीनकाल में अधिकांश ऋषि विवाहित ही होते थे ।। आश्रमों में ऋषि- मुनि ऋषिकुमारों को पढ़ाते थे, तो उनकी पत्नियाँ ऋषि कन्याओं को शिक्षा देती थीं ।। हमारी संस्कृति के अनुसार विवाह एक पवित्र बंधन और प्रत्येक मनुष्य के लिए आवश्यक धर्मकृत्य है ।।

इस धर्मकृत्य को संपन्न करते हुए ही कोई व्यक्ति अपने "अहं" का विस्तार आरंभ करता था और परिवार के अन्य सदस्यों तक अपनी आत्मभावना की परिधि को व्यापक बनाता था ।। स्वाभाविक ही है कि विवाह के उपरांत पुरुष या स्त्री की आत्मीयता का क्षेत्र और व्यापक बन जाता है तथा उसमें स्त्री, पति, संतान, स्वजन, सगे- संबंधी, पड़ोसी और घर के पशु- पक्षी तक सम्मिलित हो जाते हैं ।। इस प्रकार विवाहित स्त्री या पुरुष यदि विवाह- बंधन के मर्म को समझें तो क्रमश: अपनी उन्नति की ओर बढ़ते चलते हैं ।। दूसरों के लिए अपने को भूल जाने की, अपने स्वार्थ को कम करने तथा परिवारीजनों की हित चिंता को महत्त्व देने की अभ्यास साधना से ही गृहस्थ साधक आगे बढ़ सकते हैं और शनैशनै: तुच्छता को महानता में, संकीर्णता को उदारता में परिणत करते चल सकते हैं ।।

Table of content

1. घर-गृहस्थी मायाजाल या साधना भूमि
2. आश्रम व्यवस्था पर एक दृष्टि
3. ऋषियों की गृहस्थ-साधना
4. गृहस्थ धर्म तुच्छ नहीं है
5. गृहस्थ में वैराग्य
6. गृहस्थ एक योग साधना
7. गृहस्थ योग से परम पद की प्राप्ति

Author Pt. Shriram Sharma Acharya
Edition 2013
Publication Yug nirman yojana press
Publisher Yug Nirman Yojana Vistar Trust
Page Length 48
Dimensions 12 cm x 18 cm
  • 05:09:AM
  • 23 Jan 2020




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