सुख चाहें तो यों पाएँ

Author: Pandit Shriram Sharma Aacharya

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Preface

आशा और उत्साह कहीं से लाने अथवा आने वाली वस्तुएँ नहीं हैं । यह दोनों तेज आपके अतःकरण में सदैव ही विद्यमान रहते हैं । हाँ, आवश्यकता के समय उनको जगाना तथा पुकारना आवश्यक पड़ता है । जीवन की कठिनाइयों तथा आपत्तियों से घबरा कर अपने इन अंतरंग मित्रों को भूल जाना अथवा उनका साथ छोड़ देना बहुत बड़ी भूल है । ऐसा करने काअर्थ है कि आप अपने दुर्दिनों को स्थाई बनाते हैं, अपनी कठिनाइयों को पुष्ट तथा व्यापक बनाते हैं । किसी भी अंधकारमें, किसी भी प्रतिकूलता अथवा कठिनाई में अपने आशा, उत्साह के समन्वय को कभी मत छोडिएगा । कठिनाईयाँ आपका कुछ नहीं कर सकेंगी ।

Table of content

१ सुख चाहें तो यो पायें
२ सुख और दु:ख दृष्टिकोण मात्र हैं
३ दु:ख प्रकृति का पुण्य परिक्षण
४ तटस्थ रहिए, दु:खी मत होइए
५ प्रसन्नता की उपलब्धि सद्विचार से
६ खिन्न नहीं, प्रसन्न रहा किजिए
७ सुखी जीवन का मूलाधार : सदाचार
८ प्रयत्न करने पर भी सुख क्यों नहीं मिलता ?
Author Pandit Shriram Sharma Aacharya
Edition 2014
Publication Yug Nirman Yogana, Mathura
Publisher Yug Nirman Yogana, Mathura
Page Length 40
Dimensions 182mmX121mmX2mm
  • 06:43:PM
  • 17 Sep 2019




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