विवाहित जीवन का अलौकिक आनंद

Author: Pt. Shriram Sharma Aacharya

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Preface

आश्रम व्यवस्था हमारी देवोपम भारतीय संस्कृति का मूल आधार है । प्राचीन ऋषियों-मनीषियों ने गहन चिंतन-मनन के उपरांत मानवीय जीवन का चार भागों में विभाजन किया था । सौ वर्ष के आदर्श जीवन काल को २५-२५ वर्ष के चार खंडों में, चार आश्रमों में बांट दिया था । पहला ब्रह्मचर्य फिर गृहस्थ और पचास वर्ष की आयु पर वानप्रस्थ तथा अंतिम संन्यास आश्रम की व्यवस्था की गई थी । इसके अनुसार पहले २५ वर्षो में ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए शारीरिक एवं मानसिक रूप से अपने को परिपुष्ट बनाया जाता था । इसके बाद गृहस्थाश्रम में प्रवेश करके परिवार, समाज व राष्ट्र की सेवा करने का विधान था । वानप्रस्थ व संन्यास आश्रमों में लोक कल्याण की साधना करते हुए समाज में चतुर्दिक सुख-शांति का वातावरण निर्मित करने के सतत प्रयास में मानव जी-जान से जुटा रहता था ।

इस व्यवस्था पर यदि गंभीरतापूर्वक विचार करें तो यह स्पष्ट हो जाता है कि ब्रह्मचर्य, वानप्रस्थ और संन्यास तीनों आश्रमों का उद्देश्य यही है कि गृहस्थाश्रम को सुचारु रूप से: व्यवस्थित समुत्रत और सुख शांति से परिपूर्ण बनाया जाए । इसका एक पक्ष यह भी है कि गृहस्थाश्रम के ऊपर ही शेष तीनों आश्रमों के समुचित पालन-पोषण करने का दायित्व भी है । इसी कारण गृहस्थाश्रम को चारों में सबसे महत्वपूर्ण कहा गया है ।

Table of content

1. गृहस्थाश्रम का महत्व
2. विवाह का उद्देश्य
3. परिवार संस्था की उपयोगिता
4. पारिवारिक पंचशीलों का पालन
5. विवाह संस्कार का महत्व
6. विवाह का स्वरुप
7. विवाह संस्कार पर दहेज़ दानव की कुदृष्टि
8. जागृत एवं संस्कारवान युवक-युवतियों का दायित्व
9. कन्यादान और दहेज़ का अंतर समझें

Author Pt. Shriram Sharma Aacharya
Publication Yug nirman yojana press
Publisher Yug Nirman Yojana Vistar Trust
Page Length 32
Dimensions 12 cm x 18 cm
  • 10:08:PM
  • 5 Jun 2020




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