क्या विधवा विवाह शास्र-विरुद्ध है

Author: Pt. Shriram Sharma Aacharya

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Preface

संसार भर के मनुष्यों की मान्यता है कि प्रत्येक वयस्क व्यक्ति को चाहे वह नर हो या नारी अपनी इच्छानुसार विवाहित या अविवाहित जीवन व्यतीत करने का पूर्ण अधिकार है ।। यह अधिकार मानवीय अधिकार है ।। इससे किसी को वंचित करना उसके नागरिक अधिकारों का हनन करना है ।। इस सम्बन्ध में किसी प्रकार का अनुचित प्रतिबन्ध लगाना न्याय की स्पष्ट हत्या है ।। रोगी, कोढ़ी, पागल, नपुंसक आदि शारीरिक मानसिक असमर्थताओं से ग्रसित व्यक्तियों को विवाह के अधिकार से वंचित करना न्यायोचित हो सकता है, आर्थिक दृष्टि से जो गृहस्थ का भार उठा सकने में असमर्थ हैं उन्हें भी विवाह करने से रोका जाय तो कुछ औचित्य समझ में आता है पर जो वयस्क व्यक्ति नर या नारी अपने लिए विवाह की आवश्यकता अनुभव करते हैं ओर उसके लिए शारीरिक मानसिक दृष्टि से समर्थ हैं, उन पर इस सन्दर्भ में कोई प्रतिबन्ध रहना, मानव प्राणी को प्राप्त मूल अधिकारों के सर्वथा विपरीत है ।। इसलिए ऐसा प्रतिबन्ध संसार में कहीं है भी नहीं ।।

इस पृथ्वी पर लगभग तीन अरब मनुष्य रहते हैं ।। वे पाँच महाद्वीपों और सैकड़ों छोटे- बड़े राष्ट्रों में बँटे हैं ।। तीन हजार से अधिक मत- मतान्तरों के वे अनुयायी हैं पर किसी भी देश में किसी भी धर्म में ऐसा नियम विधान नहीं है जो समर्थ व्यक्तियों को, अपने समकक्ष साथी के साथ गृहस्थ जीवन बिताने पर कुछ रोक लगाता हो? विधवा या विधुर भी सामान्य नागरिकों की तरह आखिर मनुष्य ही हैं ।। उनका कोई ऐसा अपराध नही, जिससे उनका यह मानवीय अधिकार छीन लिया जाय ।।

Table of content

1. क्या विधवा विवाह शास्त्र विरुद्ध है ?
Author Pt. Shriram Sharma Aacharya
Publication Yug Nirman Yojna Trust, Mathura
Publisher Yug Nirman Yojana Vistar Trust
Page Length 24
Dimensions 12 X 18 cm
  • 05:29:AM
  • 14 Aug 2020




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