सार्थक एवं समग्र शिक्षा का स्वरूप

Author: Pt. Shriram Sharma

Web ID: 950

`12 Add to cart

Availability: In stock

Condition: New

Brand: AWGP Store

Preface

शिक्षा अर्थात सुसंस्कारिता का व्यावहारिक शिक्षण

विकासवादी डार्विन के अनुसार मनुष्य बंदर की औलाद है ।। बंदर की यह विशेषता है कि अपने इर्द- गिर्द जो देखता है, उसी की नकल करने लगता है ।। तोता- मैना जो सुनते हैं, उसे रटकर सुना देते हैं ।। पर मनुष्य अपने आस- पास होने वाली गतिविधियों की नकल करता है ।। यही उसकी वास्तविक शिक्षा है ।। यों वह पुस्तकों, पत्रिकाओं में पढ़ता है, उससे भी कुछ न कुछ निष्कर्ष तो निकालता ही है ।। पर इससे पाठकों में पक्ष और विपक्ष को मंथन करके निष्कर्ष पर पहुँचने की स्वतंत्र चिंतन क्षमता कम ही होती है ।। देखना यह है कि इस कमी को पूरा किस प्रकार किया जाए?

इसे अपने देश का दुर्भाग्य ही कहना चाहिए कि शिक्षा और नौकरी पर्यायवाची बन गए हैं ।। जितने बच्चे पढ़कर निकलते हैं उनकी तुलना में रिक्त स्थान कहीं कम खाली होते हैं ।। सबको नौकरी मिलना कठिन है ।। ऐसी दशा में शिक्षितों में ऐसी प्रतिभा का उपार्जन आवश्यक है, जिसके कारण उनका व्यक्तित्व निखरा हुआ हो ।। अन्यत्र जहाँ कहीं भी स्थान मिले या पैतृक धंधे को अपनाए- उसे अपने कौशल के सहारे संतोषजनक स्थिति पर पहुँचा सकें ।। सरकारी ऋण लेकर नया धंधा खोलना और उसे सफलतापूर्वक चला सकना उतना सरल नहीं है, जितना कि समझा जाता है ।।

Table of content

1. शिक्षा अर्थात सुसंस्कारिता का व्यावहारिक शिक्षण
2. कुछ उलझी समस्याएँ और उनके समाधान
3. बडा़ नहीं छोटा ही, पर सुनियोजन सरंजाम हो
4. नैतिकता का शिक्षण, परिकर के माध्यम से
5. अध्यापकों एवं अभिभावकों की बाल विकास में महत्वपूर्ण भूमिका
6. सद्ज्ञान के लिए स्वाध्याय अत्यंत आवश्यक
7. छात्रों को सामयिक समस्याओं से अवगत कराया जाए
8. सद्ज्ञान विस्तार हेतु कुछ अन्य उपाय, उपकरण भी
9. परीक्षा प्रणाली भी बदलनी पडे़गी
10. बाल विकास केंद्रों की स्थापना हो
11. सेवा साधना के सहारे व्यक्तित्व का उत्कर्ष

Author Pt. Shriram Sharma
Edition 2015
Publication Yug nirman yojana press
Publisher Yug Nirman Yojana Vistara Trust
Page Length 64
Dimensions 12 cm x 18 cm
  • 10:01:PM
  • 30 Nov 2020




Write Your Review



Relative Products