एक सामानांतर शिक्षा तंत्र

Author: Pt. Shriram Sharma Aacharya

Web ID: 932

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Preface

प्रकृति अपनी ओर से प्राणियों को स्वाभाविक ज्ञान उतनी ही मात्रा में प्रदान करती है, जिसके सहारे वह अपना अस्तित्व बनाये रह सके ।। उदरपूर्ति इसलिए आवश्यक है कि शरीर को मशीन को यदि आवश्यक तेल- पानी न मिले तो वह चलती किस प्रकार रहे? श्रम किये बिना काया के कलपुर्जे जाम होकर निकम्मे बन सकते हैं ।। इसलिए दौड़- धूप आवश्यक है ।। यह प्रयोजन पेट में भूख लगने पर उससे उत्पन्न व्याकुलता के आधार पर बन पड़ता है ।। सभी प्राणी आहार जुटाने के लिए भाग- दौड़ करते और अकल चलाते हैं ।। इस आधार पर प्राणियों की हलचल चलती रहती है और अपने शरीर निर्वाह में व्यस्त रहकर अपनी स्वस्थता अक्षुण्ण बनाये रहते हैं ।।

प्रकृति की एक और भी अपेक्षा प्राणियों से है कि अपनी प्रजातियाँ बनाये रहें ।। प्राणि समुदाय यों कभी- कभी कारणवश लड़ते- झगड़ते भी देखे गये हैं पर उनमें स्वाभाविक उत्कण्ठा यह रहती है कि विश्व उद्यान में इनके वर्ग का पौधा भी पहचान बनाये रखे ।। इसके लिए प्रजनन आवश्यक हो जाता है, पर वह बड़ा झंझट भरा और कष्ट साथ है ।। प्राणी इस पीड़ादायक और दायित्व भरे काम में क्यों हाथ डाले? इस आशंका को थान में रखते हुए रतिकर्म की सरसता का विलक्षण आधार जोड़ दिया गया है ।। वयस्क होने पर नर- मादा इसके लिए उत्सुक उल्लसित होने लगते हैं ।। जोड़ा ढूँढ़ते हैं ।। यौनाचार का जुगाड़ बिठाते हैं और हाथों- हाथ गर्भधारण के चक्कर में फँस जाते हैं ।। चूहे भी पिंजडेदान में रखी खाद्य सामग्री के लालच में ही उसमें प्रवेश करते और बुरी तरह बन्दी बन जाते हैं ।।

Table of content


1. बौद्धिक प्रगति की प्रक्रिया ही शिक्षा
2. काश ऎसी शिक्षा रही होती
3. अतिरिक्त शिक्षा का प्रबंध स्वयं करें
4. बौद्धिक कायाकल्प में समर्थ शिक्षा
5. शिक्षा एक अनिवार्य आवश्यकता
6. शिक्षा संवर्धन तंत्र का पुनर्जीवन
7. उपेक्षा से अवगति
8. शिक्षितों की नैतिक जिम्मेदारी

Author Pt. Shriram Sharma Aacharya
Publication Yug Nirman Yojna Trust, Mathura
Publisher Yug Nirman Yojna Trust
Page Length 48
Dimensions 12 X 18 cm
  • 04:55:PM
  • 26 May 2020




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