प्रज्ञा प्रवचन

Author: Brahmavarchasva

Web ID: 877

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Preface

स्रष्टा ने विश्व का उत्तरदायित्व अपने वरिष्ठ राजकुमार मनुष्य के हाथ में सौंपा है, जब तक उसका चिंतन और चरित्र अपनी गरिमा के अनुरूप रहता है, तब तक वह स्वयं सुखी रहता है और समूचे वातावरण को प्रगति, समृद्धि से भरे रहता है, "किंतु जब वह निकृष्ट चिंतन और भ्रष्ट- व्यवहार पर उतारू होता है, तो न केवल अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारता है, वरन अन्य सबके लिए भी विषबेल बोकर अनेकों प्रकार के संकट खडे़ कर देता है ।। सृष्टि- संतुलन के गड़बड़ाने में मुख्यत: मनुष्य की अवांछनीय गतिविधियाँ ही आधारभूत कारण होती हैं ।।

मनुष्य जब अत्यधिक दुराग्रही, अहंकारी और ढीठ हो जाता है, सज्जनता की रीति- नीति को बेतरह तोड़ता है और दुष्टता पर उतारू हो जाता है, तभी स्रष्टा को ऐसा कुछ करना पड़ता है, जो कष्टकर और भयंकर दीखे ।। यद्यपि सड़ा फोड़ा चीरने के लिए माता द्वारा रोगी बच्चे को अस्पताल में और डॉक्टर द्वारा चीर- फाड़ करना दोनों के ही काम निर्ममतापूर्ण दीखते हैं, पर उससे रोगी- बालक का हित ही लक्ष्य में रहता ।। दोनों ही यह चाहते हैं कि कष्ट- पीड़ित का कष्ट मिटे और वह रोज- रोज की व्यथा- वेदना से पाकर सुख- शांति का जीवन बिताये, भले ही कुछ क्षण लिए उसे कष्ट उठाना पड़े ।। आज का मानव समाज भी विषाक्त फोड़े से ग्रस्त रोगी की तरह है ।। उसके कल्याण का इन परिस्थितियों में सही मार्ग दीखता है कि फोड़ा चीर दिया जाय, ताकि सड़ा मवाद, जो हर समय वेदना उत्पन्न करता है- निकलकर दूर हो जाय ।।

Table of content

1. अवतार का उपयुक्त समय, कारण तथा कार्यक्रम
2. उज्ज्वल भविष्य की सुनिश्चित संभावनाएँ
3. जाग्रत आत्माओं की प्रस्तुत बेला में मूर्धन्य भूमिका
4. सर्व साधारण की संभावनाओं के अनुरूप स्वयं को बदलने की चेतावनी
5. प्रस्तुत समस्याओं का एक मात्र कारण तथा निवारण
6. प्रज्ञा अभियान एवं धर्म-तंत्र के पुनर्जीवन में उसकी भूमिका
7. प्रज्ञा अभियान के कार्यक्रम एवं भावी योजनाएँ

Author Brahmavarchasva
Edition 2010
Publication Yug nirman yojana press
Publisher Yug Nirman Yojana Vistara Trust
Page Length 80
Dimensions 18.5 cm x 24.5 cm
  • 03:18:PM
  • 1 Aug 2021




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