तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति

Author: Pandit Shriram Sharma Aacharya

Web ID: 83

`21 Add to cart

Availability: In stock

Condition: New

Brand: AWGP Store

Preface

जो कुछ हम देखते, जानते या अनुभव करते हैं-क्या वह सत्य है ? इस प्रश्न का मोटा उत्तर हॉ में दिया जा सकता है, क्योंकि जो कुछ सामने है, उसके असत्य होने का कोई कारण नहीं । चूँकि हमें अपने पर, अपनी इंद्रियों और अनुभूतियों परविश्वास होता है इसलिए वस्तु, व्यक्ति या परिस्थिति के बारे में जो समझते हैं, उसे भी सत्य ही मानते हैं । इतने पर भी जब हम गहराई में उतरते है तो प्रतीत होता है कि इंद्रियों के आधार पर जो निष्कर्ष निकाले जाते है; वे बहुत अधूरे, अपूर्ण और लगभग असत्यही होते हैं । शास्त्रों और मनीषियों ने इसलिए प्रत्यक्ष इंद्रियों द्वारा अनुभव किये हुए को ही सत्य न मानने तथा तत्त्वदृष्टि विकसित करने के लिए कहा है । यदि सीधे-सीधे जो देखा जाता व अनुभव किया जाता है, उसे ही सत्य मान लिया जाए तो कई बार बड़ी दुःस्थितिबन जाती है । इस संबंध में मृगमरीचिका का उदाहरण बहुत पुराना है । रेगिस्तानी इलाके या ऊसर क्षेत्र में जमीन का नमक उभर कर ऊपर आ जाता है । रात की चाँदनी में वह पानी से भरे तालाब जैसा लगता है । प्यासा मृग अपनी तृषा बुझाने के लिये वहाँ पहुँचता है और अपनी आँखों के भ्रम में पछताता हुआ निराश वापस लौटता है । इंद्रधनुष दीखता तो है, पर उसे पकड़ने के लिये लाख प्रयत्न करने पर भी कुछ हाथ लगने वाला नहीं है । जल बिंदुओं पर सूर्य की किरणों की चमक ही ऑखों पर एक विशेष प्रकार का प्रभाव डालती है और हमें इंद्रधनुष दिखाई पड़ता है, जिसका भौतिक अस्तित्व कहीं नहीं होता ।

Table of content

१. प्रत्यक्ष लगने पर भी सत्य कहाँ
२. समस्त दुःखों का कारण अज्ञान
३. सुख का केंद्र और स्रोत आत्मा
४ ईश्वर की सच्चिदानंदमय सत्ता
५ ईश्वर ज्वाला है और आत्मा चिनगारी
६. समर्थ सत्ता को खोजें
७. तत्त्वदर्शन से आनंद और मोक्ष
Author Pandit Shriram Sharma Aacharya
Edition 2010
Publication Yug Nirman Yogana, Mathura
Publisher Yug Nirman Yogana, Mathura
Page Length 112
Dimensions 180mmX120mmX5mm
  • 02:30:AM
  • 20 Jul 2019




Write Your Review



Relative Products