गायत्री की दैनिक साधना

Author: Pandit Shriram Sharma Aacharya

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Preface

गायत्री उपासना प्रत्येक द्विज का आवश्यक धर्म-कृत्य है । वैसे द्विज, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य को कहते हैं । जो लोग यज्ञोपवीत धारण कर सकते हैं, वे द्विज हैं । ऐसे सभी लोगों को गायत्री का अधिकार है । द्विज वह है, जिसका दूसरा जन्म हुआ हो । एक जन्म माता-पिताके रज-वीर्य से सभी का होता है, इसलिए मनुष्य और पशु सभी समान हैं । दूसरा आध्यात्मिक जन्म गायत्री माता और यज्ञ पिता के संयोग से होता है । गायत्री अर्थात सद्बुद्धिरूपिणी माता और यज्ञ अर्थात परमार्थ रूपी पिता को जिन्होंने अपना आध्यात्मिक माता-पिता समझ लिया है, जीवन की वस्तु समझकर परमार्थ एवं आत्म-कल्याण का साधन स्वीकार किया है, वस्तुत: वे द्विज हैं । गायत्री उपासक इसी श्रेणी के होते हैं । जो गायत्री उपासना में लगे रहते हैं,वे ऐसे हो जाते हैं । इसी प्रकार गायत्री और द्विजत्व एक साथ रहते हैं । इसी एकता के अभाव को संस्कृत में अनधिकारी कहा है । जिनमें इस प्रकार की एकता न हो, वे अनधिकारी कहे जाते हैं । उच्चभावना और गायत्री से संबंध बनाये रखने के लिए अधिकार की प्रतिष्ठा की गई है । यज्ञोपवीत को गायत्री की मूर्ति-प्रतिमा कहना चाहिए । गायत्री को हर घड़ी छाती से लगाए रखना, हृदय पर धारण किए रहना यज्ञोपवीत का उद्देश्य है । जनेऊ में तीन तार होते हैं-गायत्री में तीनचरण हैं । उपवीत में नौ लड़ें हैं, गायत्री में नौ शब्द हैं ।

Table of content

1. दैनिक गायत्री उपासना
2. श्री गायत्री चालीसा दोहा
3. नवरात्री में गायत्री साधना
4. गायत्री मंत्र
Author Pandit Shriram Sharma Aacharya
Edition 2011
Publication Yug Nirman Yogana, Mathura
Publisher Yug Nirman Yogana, Mathura
Page Length 24
Dimensions 182mmX120mmX10mm




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