महर्षि कार्ल मार्क्स

Author: Pt. shriram sharma

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Preface

उस समय जर्मन सरकार जन-जाग्रति का दमन करने पर उतारू हो गई थी। योरोप में क्रान्ति की जो हवा फैल रही थी, वह जर्मनी में भी पहुँच गई थी। जनता चाहती थी कि देश का शासन सार्वजनिक हित को दृष्टि में रखकर किया जाय और शासन संस्था में प्रजा के प्रतिनिधियों को उचित स्थान मिले। पर निरंकुश शासक इस प्रकार की माँग को “छोटे मुँह बड़ी बात” समझते थे और इसलिए जनता के मुंह को तरह-तरह से बंद करने की कोशिश कर रहे थे।

ऐसे समय में कार्लमार्क्स (सन् १८१८से१८८३) ने सरकार का मुकाबला करने के लिए “राइनिश जीतुंग” नामक अखबार का संपादन ग्रहण किया। उसकी लेखनी ऐसी जोरदार थी और वह सरकार की गलत नीतियों पर ऐसे प्रहार करता था कि कुछ ही समय में उसका नाम दूर-दूर तक प्रसिद्ध हो गया। पर साथ ही सरकारी “सेंसर” की क्रूर दृष्टि भी उस पर अधिकाधिक पड़ने लगी और उस पत्र के कार्य में तरह-तरह की विघ्न बाधाएं डाली जाने लगीं। तो भी मार्क्स ऐसे घुमा-फ़िराकर लिखता था कि वह सेंसर के फंदे से बच जाता था। अंत में सरकार ने अपने ब्रह्मास्त्र का प्रयोग किया और “राइनिश जीतुंग” को राज द्रोही बतलाकर जबरदस्ती बंद कर दिया।

जब मार्क्स ने जर्मनी में विद्रोह फैलाने के लिए ऐसा प्रचार कार्य आरम्भ किया, तो वहाँ की सरकार चौकन्नी हो गई और उसने फ्रांस की सरकार से इसकी शिकायत की। फ्रांसीसी सरकार ने मार्क्स को अपने यहाँ से निकल जाने की आज्ञा दे दी। इस पर वह बेलजियम की राजधानी ब्रूसेल्स चला गया। वहाँ पर भी वह मजदूरों के संगठन की चेष्टा करता रहा और “लीग आफ़ जस्ट” (न्याय संघ) नामक संस्था में शामिल होकर, योरोप के समस्त देशों में उसके द्वारा प्रचार कार्य की चेष्टा करने लगा।

Table of content

महर्षि कार्ल मार्क्स
Author Pt. shriram sharma
Edition 2015
Publication Yug nirman yojana press
Publisher Yug Nirman Yojana Vistara Trust
Page Length 32
Dimensions 12 cm x 18 cm
  • 07:41:PM
  • 12 Nov 2019




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