जनसंख्या विस्फोट-एक चुनौती

Author: Pt. shriram sharma

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Preface

समय के साथ मान्यताएँ भी बदलती रहनी चाहिए । उन्हें जिस देश-काल में प्रवर्तित किया जाता है, तब वे उस समय के अनुकूल तथा आवश्यक होती हैं, पर ज्यों-ज्यों परिस्थितियाँ बदलती जाती हैं उनकी उपयोगिता घटती जाती है और धीरे-धीरे व्यर्थ बन जाती हैं । ऐसा होने पर भी जब उन्हें समय के अनुसार बदला नहीं जाता है, तब वे सामाजिक रूढ़ि बनकर एक बंधन के रूप में बदल जाती हैं, समाज की प्रगति में बाधक बनती हैं और अनेक प्रकार से हानिकारक सिद्ध होती हैं । संभव है कभी यह मान्यता रही हो कि विवाह की सफलता तथा सार्थकता संतान होने में ही है । यदि विवाह होने पर संतानों की उत्पत्ति नहीं हो पाती, तो वह विवाह दांपत्य जीवन असफल समझा जाता था । बहुत संतान होना सौभाग्य का लक्षण माना जाता था । कहना न होगा कि जब यह मान्यता रही होगी तब सामाजिक तथा पारिवारिक दृष्टि से इसकी आवश्यकता एवं उपयोगिता रही होगी । ऐसा न मानने अथवा न करने से समाज को हानि की संभावना रहती होगी । उस समय यह मान्यता समाज के विकास तथा प्रगति में सहायक होती होगी ।

उस समय इस मान्यता का कारण क्या रहा होगा, इस पर विचार करने से यही समझ में आता है कि उस समय पर जनसंख्या की बहुत कमी थी । भूमि तथा साधन अधिक थे । संसार सूना और बीहड़ दीखता था । साथ ही उस समय एक परिवार के अधिक व्यक्ति मिलकर दूसरे कम संख्या वाले परिवार को दबा कर उस पर शासन करते थे । उस युग में अधिक संतान उपयोगी थी ।

Table of content

• संतान की अविवेकपूर्ण आकांक्षा
• जनसंख्या वृद्धि का रोका जाना अति आवश्यक
• संतान कितनी और क्यों पैदा करें ?
• जनसंख्या की वृद्धि रुकनी ही चाहिए
• संतानोत्पादन को निरुत्साहित किया जाए
• संतान की संख्या बढ़ाना अत्यंत घातक
• छोटा परिवार सुखी परिवार
• संतानोत्पादन का दायित्व समझबूझ कर उठाएँ
• बदलती परिस्थितियों में विचार भी बदलें
• स्वर्ग सीमित परिवार वालों को मिलेगा
• जनसंख्या वृद्धि का भयावह दृश्य एवं हमारे प्रयास

Author Pt. shriram sharma
Edition 2011
Publication Yug nirman yojana press
Publisher Yug Nirman Yojana Vistara Trust
Page Length 64
Dimensions 12 cm x 18 cm
  • 11:04:PM
  • 24 Jan 2020




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