विश्ववंद्य सन्त वसुधा जिन्हें पाकर धन्य हुई

Author: Pt Shriram sharma acharya

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Preface

भक्तिमार्ग के प्रवर्तक प्रसिद्ध धार्मिक संत स्वामी रामानंद काशी से रामेश्वरम की यात्रा पर निकले थे ।। मार्ग में एक गाँव पड़ता था - आलंदी ।। स्वामी रामानंद ने वहाँ अपना डेरा डाला और कुछ दिनों तक रुक कर जन- साधारण को ज्ञान, कर्म और भक्ति की त्रिवेणी में मज्जित कराते रहे ।। स्वामी रामानंद एक मारुति मंदिर में ठहरे हुए थे, उसी मंदिर में गाँव की एक युवती स्त्री भी प्रतिदिन दर्शन और पूजन के लिए आया करती थी ।। संयोग से एक दिन स्वामीजी का उससे सामना हो गया ।। स्त्री ने रामानंद जी को प्रणाम किया तो बरबस उनके मुँह से निकल गया पपुत्रवती भव । आशीर्वाद सुनकर युवती पहले तो हँसी फिर एकाएक चुप हो गई ।। स्वामी जी को कुछ समझ में नहीं आया उन्होंने पूछा… देवी तुम हँसी क्यों हो ? फिर एकाएक चुप क्यों हो गई ? हैं उस युवती ने कहा - मेरी हँसी और फिर चुप्पी का कारण यह है कि आप जैसे महात्मा का आशीर्वाद बिल्कुल निष्फल जाएगा । क्यों बेटी तुम्हारी कोई संतान नहीं है क्या - माथे पर सिंदूर और हाथों में चूडियाँ देखकर स्वामी जी ने उसके सधवा होने का अनुमान लगाते हुए कहा ।।

Table of content

• ज्ञान धारा बहाने वाले दक्षिण के भगीरथ संत ज्ञानेश्वर
• समर्पण ही जिनका आदर्श था गुरु अंगद देव
• सच्चे अर्थों में संत श्री वसवेश्वर
• स्वामी सहजानंद जिन्होनें संन्यास को सार्थक बनाया
• निष्ठावान लोकसेवी वल्लभ स्वामी
• साधुता और समता के जीवंत प्रतीक बाबा रामदेव
• सेवा धर्म के सिद्ध साधक भक्त पुनीत महाराज
• संत परंपरा को सार्थक सिद्ध करने वाले स्वामी कृष्णानंद
• साहसी को साधन आप मिलते हैं
• स्वामी भवानी दयाल साधुता जिन्हें पाकर धन्य हो गई

Author Pt Shriram sharma acharya
Edition 2012
Publication Yug nirman yojana press
Publisher Yug Nirman Yojana Vistara Trust
Page Length 56
Dimensions 12 cm x 18 cm
  • 07:41:PM
  • 12 Nov 2019




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