सहृदयता आत्मिक प्रगति के लिये अनिवार्य

Author: Pt Shriram sharma acharya

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Preface

असुरता की नृशंसता में परिवर्तन

मनुष्य में देवता और असुर की, शैतान और भगवान् की सम्मिश्रित सत्ता है ।। दोनों में वह जिसे चाहे उसे गिरा दे यह पूर्णतया उसकी इच्छा के ऊपर निर्भर है ।। विचारों के अनुसार क्रिया विनिर्मित होती है ।। असुरता अथवा देवत्व की बढ़ोत्तरी विचारक्षेत्र में होती है; उसी अभिवर्द्धन- उत्पादन के आधार पर मनुष्य दुष्कर्मों अथवा सत्कर्मों में प्रवृत्त हो जाता है ।। यह क्रियाएँ ही उसे उत्थान- पतन के, सुख- दुःख के गर्त में गिराती है ।।

असुरता कितनी नृशंस हो सकती है इसके छुटपुट और व्यक्तिगत उदाहरण हमें आए दिन देखने को मिलते रहते हैं ।। ऐसा सामूहिक रूप से बड़े पैमाने पर और मात्र सनक के लिए भी किया जाता रहा है ।। उसके उदाहरण भी कम नहीं हैं ।। छुटपुट लड़ाई- झगड़ों से लेकर महायुद्ध तक जितनी क्रूरताएँ; जितनी भी विनाशलीलाएँ हुईं हैं, सबके मूल में असुरता ही प्रधान रही है ।।

लड़ाइयाँ छोटी हों या बड़ी उनके मूल में मनुष्य की यह मान्यता काम करती है कि अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिए दूसरों के साथ बल प्रयोग करना उचित और आवश्यक है ।। एक ग्रीक कहावत है- शाति चाहते हो तो युद्ध की तैयारी करो" सशक्त पक्ष अपने अहं को प्रतिष्ठित करने के लिए छोटों के साथ दमन की नीति अपनाता है ।। इसमें उसे तिहरा लाभ प्रतीत होता है ।। अपने अहं की तुष्टि- आतंक से दूसरे लोगों का डरकर आत्म- समर्पण करना और दूसरे भौतिक लाभों को कमा लेना ।।

Table of content

1. असुरता की नृशंसता में परिवर्तन
2. मनुष्य चाहे तो नर पिशाच भी बन सकता है
3. कुसंस्कारों की अविराम शृंखला
4. कुसंस्कारों की अविराम शृंखला
5. मांसाहार की घृणित असभ्यता
6. स्वास्थ्य के लिए भी मांसाहार प्रतिकूल
7. इस क्रूरता में सहायक हम सब
8. क्रूरता स्वभाव बन गई तब?

Author Pt Shriram sharma acharya
Edition 2010
Publication Yug nirman yojana press
Publisher Yug Nirman Yojana Vistara Trust
Page Length 66
Dimensions 12 cm x 18 cm
  • 01:52:AM
  • 31 May 2020




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