गृहलक्ष्मी की प्रतिष्ठा

Author: Pt Shriram sharma acharya

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Preface

गायत्री मंत्र का छठा अक्षर गृहलक्ष्मी के रूप में नारी की प्रतिष्ठा की शिक्षा देता है-

रे रवे निर्मला नारी पूजनीया सतां सदा ।।
यतो हि सैव लोकेऽस्मिन साक्षाल्लश्मीर्मता बुधै: ।।

अर्थात नारी सदैव नदी के समान निर्मल है, वह पूजनीय है, क्योंकि संसार में उसे साक्षात लक्ष्मी माना गया है ।।

जैसे नर्मदा का जल सदा निर्मल रहता है उसी प्रकार ईश्वर ने नारी को स्वभावतः निर्मल अंत:करण दिया है ।। परिस्थिति के दोषों के कारण अथवा दुष्ट संगति के प्रभाव से उसमें विकार पैदा हो जाते हैं, पर यदि कारणों को बदल दिया जाए तो नारी- ह्रदय पुन: अपनी शाश्वत निर्मलता पर लौट आता है ।।

नारी लक्ष्मी का अवतार है। भगवान मनु स्पष्ट शब्दों में कह गए हैं कि जहाँ नारी का सम्मान होता है, वहाँ देवता निवास करते है ।। अर्थात उस स्थान में सुख, शांति का निवास रहता है। सम्मानित और संतुष्ट नारी अनेक सुविधाओं और सुव्यवस्थाओं का घर बन जाती है, उसके साथ गरीबी में भी अमीरी का आनंद बरसता है ।। धन- दौलत तो निर्जीव लक्ष्मी है, किंतु स्त्री तो लक्ष्मी की सजीव प्रतिमा है ।। उसके समुचित आदर, सहयोग और संतोष का सदैव ध्यान रखना चाहिए ।।

Table of content

• गृहलक्ष्मी की प्रतिष्ठा
• नारी के सहयोग के बिना नर अपूर्ण रहता है, विवाह की उपयोगिता
• विवाह आत्मविकास का प्रधान साधन है
• हमारा वैवाहिक जीवन कैसे सुखी रह सकता है
• वैवाहिक जीवन का उत्तरदात्वि
• उत्तरदायित्व का निर्वाह
• दो स्वर्णिम सूत्र
• गृहस्थ जीवन की सफलता
• दाम्पत्य जीवन में कलह से बचिये
• विवाहित जीवन में ब्रह्मचर्य का पालन
• पत्नी का सदैव सम्मान कीजिये
• स्त्रियोचित्त शिक्षा की आवश्यकता

Author Pt Shriram sharma acharya
Edition 2015
Publication Yug nirman yojana press
Publisher Yug Nirman Yojana Vistara Trust
Page Length 32
Dimensions 12 cm x 18 cm
  • 05:41:PM
  • 8 Aug 2020




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