परिवार में सुसंस्कार हेतु बलिवैश्व

Author: brahmavarchas

Web ID: 649

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Condition: New

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Preface

अन्न को ब्रह्म का एक रूप कहा गया है । काया का समूचा ढाँचा प्रकारान्तर से भोजन की ही परिणति है ।

अन्न से प्राणी का जन्म, विकास परिपुष्टता और अन्नमय कोष बनता है । भोजन मुख में रखते ही उसका स्वादानुभव होता है और पेट में उसके सूक्ष्म गुण का अनुभव होता है ।

गीता में आहार के सूक्ष्म गुणों को लक्ष्य करके उसे तीन श्रेणियों में (सात्विक, राजसिक एवं तामसिक) में विभाजित किया गया है । अन्न के स्थूल भाग से शरीर के रस, रस से रक्त रक्त से माँस, माँस से अस्थि और मजा, मेद, वीर्य आदि बनते हैं । इसलिए शरीर शास्त्री और मनोवैज्ञानिक इस सम्बन्ध में प्राय: एक मत हैं कि जैसा आहार होगा वैसा ही मन बनेगा ।

Author brahmavarchas
Edition 2014
Publication Yug nirman yojana press
Publisher Yug Nirman Yojana Vistara Trust
Page Length 32
Dimensions 9 cm x 12 cm
  • 12:09:AM
  • 6 Jun 2020




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