देखन मे छोटे लगें घाव करे गम्भीर भाग-१

Author: Pt shriram sharma acharya

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Preface

बंगला के प्रसिद्ध नाटककार गिरीश घोष को जगन्माता का साक्षात्कार करने को धुन सवार हुई ।। वे घंटो कालीघाट के मंदिर में बैठे रहते ।। पर उन्हें उस पाषाण प्रतिमा में माँ के दर्शन नहीं हो सके ।। एक दिन, दो दिन, चार दिन बीत गए पर कृपा की एक किरण भी वे न पा सके ।।

उन्होंने मंदिर जाना छोड़ दिया ।। स्वयं को एक कमरे में बंद कर लिया तथा इस विषय में चिंतिन करने लगे ।। चिंतन करने पर वे इस परिणाम पर पहुँचे कि वह एक सांसारिक जीवन जी रहे है ।। ईश्वर से साक्षात्कार करने के लिए वैराग्य आवश्यक है, गृहत्याग आवश्यक है, सांसारिक दायित्वों का त्याग आवश्यक है ।।

सन्यास ग्रहण के लिए गुरु को खोज आरंभ हुई ।। गिरीश घोष का प्रबुद्ध मन- मस्तिष्क हर किसी गेरुए वस्त्रधारी साधु बाबा को अपना पथ- प्रदर्शक स्वीकार नहीं का सकता था ।। जो स्वयं अंदर से रिक्त हों वे दूने को क्या आत्मबल है दे सकेंगे ?? इस प्रकार के रंगे सियार वहीं सिंह थोड़े ही बन सकते है ।। ऐसों एक ही महान विभूति ही रामकृष्ण परमहंस थे जिन्होंने जगन्माता से साक्षात्कार किया था ।। नर से नारायण बनने की उच्च स्तरीय साधना में वे सफल हो सके थे ।। परमहंस देव तो दिवंगत हो चुके ये ।। गिरीश को उनको सहधर्मिणी श्रीमती शारदामणि। इस संबंध में कुछ परामर्श दे सकती थीं ।।

माँ शारदा परमहंस देव के बचे हुए काम को पूरा करने में जुटी हुई थीं ।। उनके लगाए हुए आम्र कुंज को वे अपनी स्नेह सुधा सिंचित का रही थीं ।। उसमें विवेकानंद जैसे कल्प- वृक्ष भी पनप रहे थे जिन्होंने विश्व को नव- जीवन प्रदान करने वाला पथ बताया ।। अपने हृदय को उन्होंने जामाता की तरह विस्तृत किया था ।। उनके स्नेह के मोल कितने ही शिशु अनायास बिक गए थे, जिनसे रामकृष्ण मिशन को स्थापना संभव हो सकी ।।

Table of content

• सत्कार्य करना ही सच्चा सन्यास है
• निर्भीकता ही सच्चा धर्म है
• संघर्ष से घबड़ाओ मत- सफलता चरण चूमेगी
• संन्यासी कौन ?
• माँ के आभूषण
• रोटियाँ श्रम की खाओ
• निर्धन बालक की बापू को भेंट
• बापू के जीवन की तीन प्रेरक घटनाऐं
• काम कोई छोटा नही होता और न बडा़
• आदत को व्यवस्थित बनाए रखना
• मैं फूल नहीं काँटा बनूँगा
• विराट की आराधना ही सच्ची पूजा
• सम-वेदना की अनिभूति
• बहादुर हो तो सचाई की राह पर बढ़ो
• आत्म-विश्वास की विजय
• सच्ची श्रद्धांजलि
• साहसपूर्वक न्याय का पक्ष
• मर्यादा टूटी नहीं औचित्य छूटा नहीं
• सहनशीलता में महानता सन्निहित
• संगठन में ही शक्ति है
• सिद्धांत सर्वोपरि होता है
• सहकारिता ने गवर्नर बनाया
• नियमों के सामने छोटे-बड़े सब एक हैं
• समय से मूल्यवान सत्य है
• कारुणिक संवेदनशीलता
• माँ सरस्वती के उपासक
• गरीबों का मसीहा
• पत्रकारिता का आदर्श-बालमुकुंद गुप्त
• असंभव शब्द हमारी दुर्बलता का परिचायक है
• जब मन्यु जागा
• महाजनो येन गता स पंथाः
• अविस्मरणीय संस्मरण
• सफलता उन्हें मिली जिन्होंने प्रयत्न किया
• संस्मरण जो कभी भुलाए न जा सकेंगे
• आत्म-विश्वास की अजेय शक्ति
• परहित से बड़ा कोई धर्म नहीं

Author Pt shriram sharma acharya
Edition 2015
Publication Yug nirman yojana press
Publisher Yug Nirman Yojana Vistara Trust
Page Length 80
Dimensions 12 cm x 18 cm
  • 02:54:PM
  • 13 Nov 2019




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