युग परिवर्तन क्यों ? किसलिए

Author: Pt. shriram sharma

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Preface

प्रज्ञावतार का लीला- संदोह एवं परिवर्तन की वेला

इन दिनों प्रगति और चमक- दमक का माहौल है, पर उसकी पन्नी उघाड़ते हो सड़न भरा विषघट प्रकट होता है। विज्ञान, शिक्षा और आर्थिक क्षेत्र की प्रगति सभी के सामने अपनी चकाचौंध प्रस्तुत करती है। आशा की गई थी कि इस उपलब्धि के आधार पर मनुष्य को अधिक, सुखी ,समुन्नत प्रगतिशील, सुसंपन्न सभ्य, सुसंस्कृत बनने का अवसर मिलेगा ।। हुआ ठीक उलटा। मनुष्य के दृष्टिकोण चरित्र और व्यवहार में निकृष्टता घुस पड़ने से संकीर्ण स्वार्थपरता और मत्स्य- न्याय जैसी अतिक्रमाणता यह प्रवाह चल पड़ा। मानवी गरिमा के अनुरूप उत्कृष्ट आदर्शवादिता की उपेक्षा अवमानना और विलास, संचय, पक्षपात, तथा अहंकार का दौर चल पड़ा लोभ, मोह और अहंकार को कभी शत्रु मानने, बचने, छोड़ने की शालीनता अपनाई जाती थी अब उसका अता- पता नहीं दीखता और हर व्यक्ति उन्हें के लिए मरता दीखता है। परंपरा उलटी तो परिणति भी विघातक होनी चाहिए थी, हो भी रही है। शक्ति संपन्नता पक ओर- विनाश दूसरी ओर देखकर हैरानी तो अवश्य होती है, पर यह समझने में भी देर नहीं लगती कि भ्रष्ट चिंतन और दुष्ट आचरण अपनाने पर भौतिक समृद्धि से अपना ही गला कटता है, अपनी ही माचिस से आत्मदाह जैसा उपक्रम बनता है।

Table of content

• प्रज्ञावतार का लीला-संदोह एवं परिवर्तन की वेला
• सृजन और ध्वंस एक ही सिक्के के दो पहलू
• महाकाल की प्रताडना भरी चेतावनी
• आसार बताते हैं कि संकट और बढेंगे
• नव सृजन का आश्वासन आशा की ज्योति
• एकता समता और सुव्यवस्था ही-भावी युग की रुपरेखा
• आद्यशक्ति की युग संधि की वेला में महती भूमिका
• सामूहिक धर्मानुष्ठानों से वातावरण संशोधन

Author Pt. shriram sharma
Edition 2010
Publication yug nirman yojana press
Publisher Yug Nirman Yojana Vistara Trust
Page Length 64
Dimensions 12 cm x 18 cm
  • 06:10:PM
  • 15 Nov 2019




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