प्रबुद्ध वर्ग धर्मतन्त्र को सँभाले

Author: Pt Shriram sharma acharya

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Preface

वैयक्तिक एवं सामाजिक प्रगति की सारी सम्भावना इस बात पर टिकी हुई है कि उनकी विचारणा एवं कार्य-पद्धति सही हो। किसी दीन-दुःखी की तात्कालिक सहायता तो कुछ सामयिक सहारा देकर की जा सकती है, पर किसी की कोई भी समस्या दूसरों के सहयोग से स्थाई रूप से हल नहीं हो सकती। रोगी का रोग दवा से नहीं संयम से दूर हो सकता है। डाक्टर कितनी ही अच्छी औषधि दे, पथ्य परहेज न रखने वाले मरीज की बीमारी लौट-लौटकर फिर आती रहेगी। अन्य-वस्त्र देकर गरीबी का कोई हल नहीं हो सकता है। किसी को भोजन देकर उसकी तात्कालिक क्षुधा मिटाई जा सकती है, पर ऐसे भूखे-नंगे को सदा कौन भोजन देगा ? उनकी गरीबी तो तभी दूर होगी, जब वे उद्योग और परिश्रम द्वारा कुछ कमाने लग जाऐं। यही बात अन्य सभी समस्याओं के सम्बन्ध में भी हैं। मनोविकार ही समस्त आपत्तियों और अभावों की जड़ हैं, उनका समाधान करना है तो लोगों की विचार पद्धति को ही सुधारना होगा। किसी के विचार सुधार देने, उसकी विचारणा सही कर देने से बढ़कर और कोई पुण्य परोपकार हो नहीं सकता। इससे बड़ा कर्म और कोई नहीं। ज्ञान-दान से ब्रह्म-दान से बढ़कर और कोई बड़ा पुण्य इस धरती पर है नहीं, इसे जो ब्राह्मण आजीवन करते रहने का व्रत लेते थे, वे धरती के देवता भूसुर माने जाते थे। आज इस वर्ग का अभाव हो गया है इस अभाव की पूर्ति के लिए प्रत्येक प्रबुद्ध व्यक्ति को अपने आपको समर्पित करना चाहिए। आज ऐसे ही भावाशील व्यक्तियों की आवश्यकता है, जो ब्रह्म कर्म में—जन जागरण में संलग्न होकर अपना समस्त विश्व का कल्याण कर सकने में समर्थ हो सकें।

Author Pt Shriram sharma acharya
Edition 2011
Publication Yug nirman yojana press
Publisher Yug Nirman Yojana Vistara Trust
Page Length 32
Dimensions 12 cm x 18 cm
  • 05:15:PM
  • 8 Aug 2020




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