भारतीय संस्कृति जीवन दर्शन

Author: pt shriram sharma acharya

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Preface

जब कोई समाज कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी अपने व्यक्तिगत मान-अपमानों की परवाह किए बिना अपने राष्ट्र, अपनी मातृभूमि के अस्तित्व पर आए संकट या संघर्ष में अपने प्राणों की बाजी लगाता है या फिर बलिदान हो जाता है, तो वह व्यक्तिगत रूप से उस राष्ट्र और समाज की संस्कृति की ही रक्षा करता है और बलिदान होना ही, उस बलिदानी वीर पुरूष की संस्कृति है ।

यह संस्कृति ही है, जो राष्ट्र पर मर मिटने के लिए प्रेरित करती है और मर कर भी जब संतोष नहीं होता है, तो बलिदानी वीर पुरूष अगले जन्म में भी अपनी उसी मातृभूमि पर पैदा होकर अपने प्राणों को अपनी मातृभूमि के लिए अर्पित करने की ईश्वर से कामना करता है ।

कहते हैं कि किसी भी राष्ट्र और उसके नागरिकों के अस्तित्व के लिए संस्कृति उतनी ही महत्वपूर्ण है, जितना कि उनके लिए भोजन, हवा और पानी । जिस प्रकार भोजन, हवा और पानी के बिना कोई राष्ट्र और उसके नागरिक जीवित नहीं रह सकते उसी प्रकार बिना संस्कृति के राष्ट्र और नागरिकों का कोई अस्तित्व नहीं रह सकता है । इसलिए यह सत्यता हैं कि संस्कृति किसी व्यक्ति के प्राणों की रक्षा भले ही न करती हो, पर राष्ट्र के अस्तित्व की रक्षा अवश्य करती है । इसलिए प्रत्येक राष्ट्र और जाति की अपनी अलग-अलग संस्कृति होती है, उसी के अनुरूप उस समाज, उस राष्ट्र और उस जाति की पहचान होती है ।

Table of content

• भारतीय संस्कृति
• भारतीय संस्कृति के मानबिन्दु
• भारतीय संस्कृति की विशेषताएँ
• भारतीय संस्कृति की मान्यताएँ
• भारतीय जीवन शैली
• भारतीय संस्कृति के प्रतीक
• भारतीय संस्कृति में देववाद
• भारतीय संस्कृति में सामाजिक पक्ष
• सर्वोपयोगी वर्णाश्रम व्यवस्था
• गायत्री, गौ, गीता और गंगा जी


Author pt shriram sharma acharya
Edition 2011
Publication yug nirman yojana press
Publisher Yug Nirman Yojana Vistara Trust
Page Length 176
Dimensions 121X178X8 mm
  • 08:23:PM
  • 12 Jul 2020




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