शिक्षा एवं विद्या-49

Author: Pt shriram sharma acharya

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Preface

परमपूज्य गुरुदेव ने वाड्मय के इस खंड में शिक्षा एवं विद्या के इसी अंतर को बताते हुए आज की शिक्षण व्यवस्था की कमियाँ एवं सुसंस्कारिता संवर्द्धन करने वाली गुरुकुलस्तरीय विद्या को उसमें समाविष्ट किए जाने की महत्ता प्रतिपादित की है । शिक्षा का स्तर जहाँ ऊँचा होगा, निश्चित रूप से वहाँ सभ्यता का विकास सर्वोच्च स्तर पर होगा, किंतु यदि शिक्षा के साथ-साथ विद्या या दीक्षा भी जुड़ी होगी तो संस्कारवान सुसंततियाँ समाज में बढ़ती चली जाएँगी । शिक्षा जहाँ सभ्यता के विकास के लिए आवश्यक है, व्यावहारिक ज्ञान के संवर्द्धन तथा अपने पैरों पर खड़े होने के लिए जरूरी है वहाँ विद्या अपने जीवन के उद्देश्य को समझने, अनगढ़ता को सुगढता में बदलने और जीवन जीने की कला के शिक्षण के रूप में एक पूरक की भूमिका निभाती है । इसके लिए पढ़ाई पूरी कराना और उससे आगे का शिक्षण भी कराना हर समाज के लिए आवश्यक है; किंतु यह परिश्रम अधूरा माना जाएगा यदि शिक्षार्थियों में संवेदना के विकास, सतवृत्तियों के संवर्द्धन, समाज परायण बनने का शिक्षण साथ-साथ नहीं दिया गया । जब शिक्षा एक साधन और व्यक्तित्व विकास एक साध्य बन जाता है तो फिर शिक्षा को उतना महत्त्व न देकर विद्या संवर्द्धन के निमित्त किए गए आध्यात्मिक स्तर के प्रयास भूमिका निभाते देखे जा सकते हैं । अब न तो छात्रों में वह पात्रता है और न ही विनम्रता । शिक्षक भी अपनी गरिमा के अनुरूप वह भूमिका नहीं निभा पा रहे हैं, जो प्राचीनकाल के गुरुकुलों के प्राध्यापक निभाते थे । समस्त प्रकार की प्रतिकूलताओं में रहते हुए भी गुरुकुल से निकलने वाला छात्र चरित्रनिष्ठा, प्रतिभा व लोकसेवी प्रवृत्ति की दृष्टि से इतना खरा पाया जाता था कि सर्वसाधारण द्वारा इन्हें सतत सम्मान मिलता था । यदि

Table of content

१ सार्थक एवं सर्वांगपूर्ण शिक्षा का स्वरुप
२ एक समानान्तर शिक्षा तंत्र
३ छात्र -निर्माण में शिक्षकों एवं अभिभावको की महती भूमिका
४ शिक्षा-विस्तार ही समाज की प्रगति का मूल आधार
५ शिक्षा ही नहीं विद्या भी

Author Pt shriram sharma acharya
Dimensions 20 cm x 27 cm
  • 07:40:PM
  • 20 Nov 2019




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