सूक्ष्मीकरण एवं उज्जवल भविष्य का अवतरण,भाग 1-28

Author:

Web ID: 392

`105
`150
Add to cart

Availability: In stock

Condition: New

Brand: AWGP Store

Preface

प्रस्तुत वाड्मय का खंड एक दस्तावेज है, बदलते युग की ऐसी परिस्थितियों का, जो कभी लगता था कि मानवीय पुरुषार्थ से सहस्रों वर्षों में भी परिवर्तित नहीं होंगी, परंतु उज्ज्वल भविष्य के सूक्ष्मदर्शी परमपूज्य गुरुदेव ने युग प्रत्यावर्तन की इस प्रक्रिया का, कलियुग के समापन व सतयुग के आगमन के पूर्व दृष्टिगोचर होने वाली विश्वव्यापी उथल- पुथल का जो विवरण इसमें लिखा है, वह बताता है कि ऋषि- प्रज्ञा भविष्य के झरोखे में झाँककर सब कुछ बता जाती है ।। समझने वाले न समझ पाएँ तो यह उनकी नादानी है ।।

महाकाल और युग प्रत्यावर्तन- प्रक्रिया के माध्यम से, आज से तीस वर्ष पूर्व युगऋषि ने लिख दिया था कि आज जो भी कुछ प्रतिकूल अनीति- दुराचरण भरा दिखाई दे रहा है, वह महाकाल की सत्ता द्वारा सुव्यवस्थित किया जाएगा ।। महाकाल का अर्थ है- समय की सीमा से परे एक ऐसी अदृश्य प्रचंड सत्ता जो सृष्टि का सुसंचालन करती है, दंड- व्यवस्था का निर्धारण करती है एवं जहाँ कहीं भी अराजकता, अनुशासनहीनता दिखाई देती है, वहाँ सुव्यवस्था- स्थापना हेतु अपना सुदर्शन चक्र चलाती है ।। इसे अवतार का प्रवाह भी कह सकते हैं, जो समय- समय पर प्रतिकूल परिस्थितियों से निपटने व सामान्य सतयुगी स्थिति लाने हेतु अवतरित होता रहा है ।। अपने विनाश की स्वयं खाई खोद रहे मानव के विनाशकारी चिंतन की व्यवस्था, कर्मफल व्यवस्था का विधान कैसे करता है ?? यह इस खंड में पढ़कर देखा- समझा जा सकता है ।।

परमपूज्य गुरुदेव ने लिखा है कि जब लोक- मानस संतुलित नहीं रह पाता- नर पिशाच की तरह आचरण करने लगता है, तब मंगलमय शिव रौद्ररूप धारण कर डमरू- नाद करते हैं ?? उनके तांडव की थिरकन से ज्वालाएँ उठने लगती हैं एवं इस अग्नि में वह सब कुछ जलकर नष्ट हो जाता है, जो अवांछनीय है, अनुपयुक्त है, अनर्गल है, अशुभ है ।।

Table of content

• हमारी सूक्ष्मीकरण साधना
• प्रतिभाओं का उद्भव और विकास
• सृष्टा का सर्वोपरि उपहार- प्रखर प्रज्ञा
• अनुष्ठानों की आवश्यकता क्यों?
• शान्तिकुंज और उसका प्रज्ञा- अभियान
• लोकसेवा आज का सबसे बड़ा पुण्य- परमार्थ
• सृजन शिल्पी की आचार संहिता

Dimensions 20 cm x 27 cm
  • 08:10:AM
  • 25 Jan 2020




Write Your Review



Relative Products