सूक्ष्मीकरण एवं उज्जवल भविष्य का अवतरण-2

Author: Pt Shriram sharma acharya

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Preface

अपनी सूक्ष्मीकरण साधना को पूज्यवर ने वाड्मय के इस खण्ड में उज्ज्वल भविष्य का आधार बताते हुए इस योगाभ्यास तपश्चर्या के विभिन्न पहलुओ को स्पष्ट किया है । चैत्र नवरात्रि ११८४ से आरम्भ हुई उनकी यह साधना बसंत पर्व ११८६ पर समाप्त हुई । इस अवधि में वे नितान्त एकाकी रहे । उनके साथ परम वंदनीया माताजी व दो उनके निजी सहायक यदाकदा उपस्थित रहते थे किन्तु वे इनके अतिरिक्त पूज्यवर न तो किसी से मिले और न कक्ष से बाहर आकर किसी को सशरीर दर्शन दिये इस अवधि में लेखनी की उनकी साधना निरन्तर चलती रही । इस अवधि में आहार भी उनका सूक्ष्मतम रहा । इस दौरान किये गये तप को उनने प्राचीन काल के गुफा सेवन, समाधि, छाया-पुरुष की सिद्धि की साधना नाम दिया । अदृश्य स्तर की सत्ताएँ इस अवधि में किस तरह तप-साधना में सहायता देती हैं व उच्चस्तरीय प्रयोजन के लिए, प्रतिभाओं के जागरण व उनके परिष्कार के लिए किये जा रहे प्रयासों को किस तरह सफल बनाती हैं, इसे इस खण्ड में विस्तार से पढ़कर समझा जा सकता है ।

परमपूज्य गुरुदेव ने पंच वीरभद्रों के जागरण की बात इस सूक्ष्मीकरण सावित्री साधना के प्रसंग में स्थान-स्थान पर की है । अपनी काया में विद्यमान पाँच कोषों अन्नमय, मनोमय, प्राणमय, विज्ञानमय, आनन्दमय कोषों को पाँच वीरभद्रों के रूप में कैसे विकसित किया जा सकता है, यह साधना-विधि समझाते हुए स्वयं पर दैवी सत्ताओं द्वारा संपन्न हुए प्रयोगों को उनने बताया है । युग-परिवर्तन के लिए इन दिनों ऐसी प्रतिभाओं की नितान्त आवश्यकता है जो लोकमंगल के लिए अपनी प्रतिमा और पुरुषार्थ लगा सकें । अत: विद्वान, कलाकार, धनवान, राजनीतिज्ञ जैसी संवेदनशील प्रतिमाओं का आह्वान किया गया है ।

Table of content

• अनौचित्य का प्रतिकार
• इक्कीसवीं सदी और उसकी उज्ज्वल सम्भावनाएँ
• इक्कीसवीं सदी अवतरण के आवश्यक अनुबन्ध
• प्रज्ञावतार का लीला- सन्दोह
• प्रज्ञावतार की विस्तार- प्रक्रिया
• सतयुग की वापसी

Author Pt Shriram sharma acharya
Dimensions 20 cm x 27 cm
  • 01:14:AM
  • 6 Jun 2020




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