अध्यात्म चेतना का ध्रुव केन्द्र देवात्मा हिमालय

Author: pt. shriram sharma acharya

Web ID: 298

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Preface

पदार्थों और प्राणियों के परमाणुओं-जीवकोषों में मध्यवर्ती नाभिक ‘‘न्यूक्लियस’’ होते हैं। उन्हीं को शक्ति स्रोत्र कहा गया है और घिरे हुए परिकर को उसी उद्गम से सामर्थ्य मिलती है तथा अवयवों की सक्रियता बनी रहती है। यह घिरा हुआ परिकर गोल भी हो सकता है और चपटा अण्डाकार भी। यह संरचना और परिस्थितियों पर निर्भर है।

पृथ्वी का नाभिक उत्तरी ध्रुव से लेकर दक्षिणी ध्रुव की परिधि में मध्य स्थान पर है। उनके दोनों सिरे अनेकानेक विचित्रताओं का परिचय देते हैं। उत्तरी ध्रुव लोक-लोकान्तरों से कास्मिक-ब्रह्माण्डीय किरणों को खींचता है। जितनी पृथ्वी को आवश्यकता है उतनी ही अवशोषित करती है और शेष को यह नाभिक दक्षिणी ध्रुव मार्ग से अन्तरिक्ष में नि:सृत कर देता है। इन दोनों छिद्रों का आवरण मोटी हिम परत से घिरा रहता है। उन सिरों को सुदृढ़ रक्षाकवच एवं भण्डारण में प्रयुक्त होने वाली तिजोरी की उपमा दी जा सकती है। प्राणियों के शरीरों और पदार्थ परमाणुओं में भी यही व्यवस्था देखी जाती है। अपने सौरमण्डल का ‘‘नाभिक’’ सूर्य है, अन्य ग्रह उसी की प्रेरणा से प्रेरित होकर अपनी-अपनी धुरियों और कक्षाओं में भ्रमण करते हैं।

Table of content

• दिव्य चेतना का केन्द्र हिमालय का हृदय
• देवात्मा हिमालय क्षेत्र की विशिष्टतायें
• अदृश्य चेतना का दृश्य उभार
• अनेकानेक विशेषताओं से भरा पूरा हिमप्रदेश
• पर्वतारोहण की पृष्ठभूमि
• तीर्थ स्थान और सिद्ध पुरुष
• सिद्ध पुरुषों का स्वरूप और अनुग्रह
• सूक्ष्मधारियों से सम्पर्क
• हिमक्षेत्र रहस्यमयी दिव्य सम्पदायें
• दैवी सहायता मात्र पुण्य प्रयोजनों के लिये

Author pt. shriram sharma acharya
Publication Yug nirman yojana press
Publisher Yug Nirman Yojana Vistara Trust
Page Length 64
Dimensions 12 cm x 18 cm
  • 02:24:AM
  • 20 Jul 2019




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