स्वामी रामतीर्थ

Author: pt. shri ram sharma acharya

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Preface

जिस समय स्वामी रामतीर्थ जापान होकर अमेरिका पहुँचे तो जहाज पर आपको बिना किसी तरह के सामान के देखकर एक अमेरिकन सज्जन को बड़ा आश्चर्य हुआ । तपस्या की ज्योति और प्रेम की भावना से परिपूर्ण ऐसा चेहरा उसने पहले कभी नहीं देखा था । वह उनके पास आकर पूछने लगा-
प्रश्न-आपका सामान है?
उत्तर-मेरे पास इतना ही सामान है - जो मेरें शरीर पर है ।
प्रश्न-तो फिर आप अपना रुपया-पैसा कहीं रखते है ?
उत्तर मेरे लिए रुपया-पैंसो अपने पास रखना मना है ।
प्रश्न-आप कहाँ जायेंगे? क्या आप अमेरिका में किसी को जानते है? आपका कोई मित्र नहीं है ?
उत्तर-हाँ, मैं आपको जानता हूँ आप ही मेरे मित्र हैं ।
स्वामी जी के इस आंतरिक आत्म-भाव को देखकर वह अमेरिकन सज्जन, जिसका नाम मि० हिल्लर था, चकित रह गया । वह उसी क्षण उनका भक्त बन गया और उन्हें अपने साथ घर ले गया । स्वामीजी को उसने दो वर्ष तक अपने यहाँ रखा ।
अमेरिका में ही एक महिला स्वामी राम से मिलने आई । वह बड़ी दुःखी थी, क्योंकि उसका बच्चा मर गया था । वह चाहती थी राम करके सुखी होने का उपाय बता दें ।
स्वामी जी ने कहा-
राम खुशी बेचता है, पर तुम्हें उसकी कीमत देनी होगी ।
स्त्री-आप जो कुछ माँगे, मैं देने को तैयार हूँ ।
स्वामी जी-सुख के राज्य का सिक्का दूसरा ही है और तुम्हें राम के देश का ही सिक्का देना पड़ेगा ।

Table of content

1. स्वामी रामतीर्थ
2. व्यावहारिक वेदांत के प्रचारक- स्वामी रामतीर्थ
3. स्कूल और कॉलेज की शिक्षा
4. त्याग और तपस्या का विद्यार्थी जीवन
5. परोपकार की सक्रिय साधना
6. सांसारिक विभूतियों के त्याग की प्रवृति
7. भक्ति और वेदांत का अध्ययन
8. संन्यास-आश्रम में प्रवेश
9. मथुरा के धर्म सम्मेलन में
10. विदेशों में धर्म-प्रचार
11. अमेरिका में दो वर्ष तक उपदेश
12. स्वामी जी का सच्चा वेदांत
13. देश-भक्ति और समाज-सेवा के महान प्रेरक
14. अपनी आत्मा को पहचानिये


Author pt. shri ram sharma acharya
Edition 2013
Publication yug nirman yojana vistar trust
Publisher yug nirman Press, Mathura
Page Length 32
Dimensions 121X181X3 mm
  • 06:05:PM
  • 15 Nov 2019




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