रहस्यमय ब्रह्माण्ड एवं हमारा सौर परिवार

Author: DSVV

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Preface

भारतीय चिंतन धारा के अनुसार चतुर्दश लोकों की समष्टि का ही नाम ब्रह्माण्ड है। इसका नियमन सत्य लोक से होता है ये लोक भौतिक शरीर के लिए अगम्य हैं। आधुनिक विज्ञान के अनुसार जहाँ हज़ारों लाखों आकाश गंगायें भ्रमण एवं प्रसरण शील हैं उसे ब्रह्माण्ड कहा जाता है। एक अर्थ में इसे अंतरिक्ष भी कह सकते हैं। जिसके मध्य में ग्रह, नक्षत्र, तारे एवं तारे समूह विद्यमान रहते हैं उसे अंतरिक्ष कहते हैं। इस आधार पर ही कुछ लोगों ने अंतरिक्ष को ही ब्रह्माण्ड कह दिया है, जबकि ब्रह्माण्ड तो उसे कहा जाएगा जिसमे अंतरिक्ष के सहित समग्र दृश्य जगत विद्यमान है। इसका स्वरुप कैसा है ? यह कितना बड़ा है ? आदि प्रश्नों का उत्तर दे पाना संभव नहीं है क्योंकि हम इसी में विद्यमान हैं। और जिधर भी देखते हैं उधर अनंत और अपार दिखाई देता है। इसलिए वेदों में इसे अनन्तोऽस्यपारोऽसि कहा गया है।

Table of content

1. ब्रह्माण्ड
2. भारतीय चिंतन धारा में ब्रह्मंडोत्पति के सिद्धांत
3. ब्रह्माण्ड के स्थूल सदस्य
4. शक्ति सागर की प्रचंड लहरें-ब्रह्माण्ड किरणें
5. सौर परिवार
6. द्युलोक
7. वेधशाला
8. सूर्य संक्रांति सारिणी
9. वेलांतर सारिणी
10. क्रांति सारिणी
11. हरिद्वार का स्पष्टान्तर
12. संदर्भग्रंथ
Author DSVV
Edition 20136
Publication Yug Nirman Yojana Press
Publisher Yug Nirman Yojana Vistar Trust
Page Length 150
Dimensions 14 cm x 21.5 cm
  • 12:26:AM
  • 6 Jun 2020




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