राष्ट्र गौरव

Author: Vidyat Mandal

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Preface

एक राष्ट्र के रूप में भारत के अस्तित्व एवं उसकी अस्मिता की पहचान उसकी गौरवशाली सांस्कृतिक परम्पराओं, उपलब्धियों एवं मूल्यों में निहित है । विज्ञान, कला और धर्म आदि क्षेत्रों में भारत ने विश्व को ऐसे अनेकों अजस्र अनुदान दिये, जिनके बल पर इसे जगद्गुरु कहा गया तथा चक्रवर्तित्व के मान से सम्मानित किया गया । हमने राजनीतिक आधार पर भारत की सीमाओं को पार करके सैन्य- अभियानों, हिंसा तथा रक्तपात से किसी भी अन्य देश पर अपने स्वत्व की स्थापना की चेष्टा नहीं की । हमने तो विश्व मानवता को मूल्यपरक जीवन जीने हेतु ऐसे तत्त्व प्रदान किए जिससे वह मानवीयता की दिशा में अग्रसर हो सके । हमारा चक्रवर्तित्व हमारी इसी उपलब्धि में निहित है और इसी कारण हमारी इस सांस्कृतिक विरासत को विश्व-संस्कृति कहकर अभिहित किया गया । भारत की धरती के कण-कण में संस्कार भरे हुए हैं, फलत इसे देवभूमि भी कहा जाता है । यह भूमि सदा से सम्वेदना सिक्त रही है और इसने सदैव समर्पण, त्याग तथा बलिदान की शिक्षा दी है । इसने हमें सदैव इन संस्कारों को विश्व में प्रसारित करने और उन्हें स्थापित करने की प्रेरणा दी है ।

यह इतिहास का सच है कि अपनी इस सांस्कृतिक धरोहर के बल पर ही हम यश, समृद्धि एवं वैभव के शिखर पर पहुँचे थे । हमारी यह आभा समस्त विश्व को आलोकित तथा आकृष्ट करती थी तथा मानवता सदैव हमसे कुछ नया तथा विशिष्ट पाने की अपेक्षा करती थी । आज स्थितियाँ इससे भिन्न हैं । हम अपनी सांस्कृतिक मान्यताओं और मूल्यों को विस्मृत ही नहीं, वरन् अस्वीकृत करते जा रहे हैं । परिणाम स्वरूप अपने अतीत के प्रति स्वाभिमान तथा राष्ट्र के प्रति गौरव का भाव जो हमें विश्व में श्रेष्ठता की अनुभूति कराता था-धूमिल एवं क्षीण होता जा रहा है ।

Table of content

1. राष्ट्र एवं राष्ट्रीय गौरव
2. राष्ट्र की गौरवमयी संस्कृति
3. विज्ञान की थी गरिमामयी परम्परा
4. प्रतीकों की गरिमामयी परम्परा
5. विभूतियों का आइना राष्ट्रोत्थान की साधना
6. भारतीय कला के कुछ विशिष्ट अवशेष

Author Vidyat Mandal
Edition 2007
Publication Yugchetana Trust
Publisher Himanshu Printers Dwara Parimal Publication
Page Length 192
Dimensions 14 cm x 21.5 cm
  • 02:43:AM
  • 14 Jul 2020




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