गायत्री के चौदह रत्न

Author: Pt. Shriram Sharma Aacharya

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Preface

ईश्वरीय सत्ता का तत्त्वज्ञान

ओमित्येव सुनामध्येयमनद्यं विश्वात्मनो ब्रह्मण:
सर्वेष्वेव हि तस्य नामसु वसोरेतत्प्रधानं मतम्।
यं वेदा निगदन्ति न्यायनिरतं श्रीसच्चिदानन्दकम्
लोकेशं समदर्शिनं नियमिनं चाकारहीनं प्रभुम्।।

अर्थ- जिसको वेद न्यायकारी, सच्चिदानंद, संसार का स्वामी, समदर्शी, नियामक और निराकार कहते हैं। जो विश्व की आत्मा है। उस ब्रह्म के समस्त नामों से श्रेष्ठ नाम, ध्यान करने योग्य ऊँ यह मुख्य नाम माना गया है।

गायत्री स्मृति के प्रथम श्लोक के अनुसार ऊँ भू: भुव: स्व: का भावार्थ इस पुस्तक के आरंभ में (भूमिका में) दिया जा चुका है। गायत्री गीता में इन प्रणव और व्याहृतियों के चार पदों के लिए अलग-अलग- चार श्लोक हैं। उन चारों की विवेचना अब इन पृष्ठों पर की जा रही है। इस प्रकार प्रणव और व्याहृतियों का दोहरा अर्थ जानने का सुअवसर पाठकों को प्राप्त होगा।

Table of content

1. ईश्वरीय सत्ता का तत्त्वज्ञान
2. सर्वत्र अपना ही प्राण बिखरा पड़ा है
3. कर्मयोग की शिक्षा
4. स्थिरता और स्वस्थता का संदेश
5. मृत्यु से मत डरिए
6. शक्तिशाली एवं तेजस्वी बनिए
7. अच्छाई को ही ग्रहण कीजिए
8. निष्पाप बनाने की प्रेरणा
9. देवत्व का अवलम्बन कीजिए
10. दैवी संपत्तियों का संचय कीजिए
11. विवेक का अनुशीलन
12. आत्मसंयम और परमार्थ का मार्ग
13. प्रोत्साहन की आवश्यकता
14. धर्मशास्त्र का सार-गायत्री


Author Pt. Shriram Sharma Aacharya
Edition 2013
Publication Yug Nirman Yojana Vistara Trust
Publisher Yug Nirman Yojana Vistara Trust
Page Length 88
Dimensions 12 cm x 18 cm
  • 06:32:PM
  • 26 May 2020




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