सदाचरण और मर्यादा पालन

Author: Pt. Shriram Sharma Aacharya

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Preface

परमात्मा ने हर मनुष्य की अन्तरात्मा में एक मार्गदर्शक चेतना की प्रतिष्ठा की है, जो उसे उचित कर्म करने की प्रेरणा देती एवं अनुचित करने पर भर्त्सना करती रहती है ।। सदाचरण, कर्तव्यपालन के कार्य धर्म या पुण्य कहलाते हैं, उनके करते ही तत्क्षण करने वाले को प्रसन्नता एवं शांति का अनुभव होता है ।। इसके विपरीत यदि स्वेच्छाचार बरता गया है, धर्म मर्यादाओं को तोड़ा गया है, स्वार्थ के लिए अनीति का आचरण किया गया है, तो अन्तरात्मा में लज्जा, संकोच, पश्चात्ताप, भय और ग्लानि का भाव उत्पन्न होगा ।। भीतर अशांति रहेगी और ऐसा लगेगा मानों अपनी अंतरात्मा ही अपने को धिक्कार रही है ।।

Table of content

1. कर्मों का सामूहिक फल
2. कर्तव्य धर्म की मर्यादा तोडिये मत
3. शुद्ध व्यवहार सीखें-सामाजिक मर्यादा सुस्थिर रखें
4. शुद्ध व्यवहार पवित्र आचार
5. नागरिकता और नैतिकता की आधारशिला शिष्ट-व्यवहार
6. मनुष्यता की शोभा

Author Pt. Shriram Sharma Aacharya
Publication Yug Nirman Yogana, Mathura
Publisher Yug Nirman Yogana, Mathura
Page Length 64
Dimensions 12X18 cm
  • 05:18:PM
  • 26 May 2020




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