समझदारों की नासमझी

Author: Pt. Shriram Sharma Aacharya

Web ID: 1208

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Preface

मनुष्य की प्रधान विशेषता उसकी विचारशीलता है ।। इसी आधार पर उसकी विचारणा, कल्पना, विवेचना, धारणा का विकास होता है ।। अन्य प्राणियों की विचार परिधि पेट प्रजनन, आत्मरक्षा जैसे प्रयोजनों तक सीमित रहती है ।। वे इसके आगे बढ़कर विश्व व्यवस्था, निजी जीवनचर्या, भावी संभावना आदि के संबंध में कुछ सोच नहीं पाते, अधिक सुविधा पाने और प्रतिस्पर्द्धा का आक्रमण करने जैसा आवेश भी यदाकदा उभरते रहते हैं ।। ज्यों- त्यों करके समय बिताते हैं और नियतिक्रम के अनुसार मृत्यु के मुख में चले जाते हैं ।।

मनुष्य को भगवान ने ऐसा विकसित मनःसंस्थान दिया है, जिसके सहारे वह बहुत कुछ सोच सकता है ।। भूतकालीन घटनाओं से अनुभव संपादित करता है, वर्तमान की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए भरसक प्रयत्न करता है ।। भविष्य को अधिक सुखद- समुन्नत बनाने के लिए भी प्रयत्न करता है, नीति, धर्म, समाज आदि के संबंध में मर्यादाओं एवं परंपराओं का भी यथा अवसर पालन करता है ।। सहयोग उसका विशेष गुण है, उसी आधार पर वह आदान प्रदान के आधार खड़े करता है और सुविधाएँ संजोने प्रगति के आधार खड़े करने के लिए जो कुछ बन पड़ता है सो करता है ।। इन्हीं मानसिक विशेषताओं के कारण उसमें संकल्पशक्ति, इच्छाशक्ति, साहसिकता, तत्परता आदि विशेषताओं का अभिवर्धन हुआ है वह अन्य प्राणियों की तुलना में अधिक सुविकसित बन सका है ।।

Table of content

1. बुद्धिमान की मूर्खता
2. धन की अनावश्यक संचय और अपव्यय
3. शिक्षा के संदर्भ में उपेक्षा क्यों बरतें ?
4. नाव में वजन बढ़ाते चलने की मूर्खता
5. संपन्नता नहीं महानता
6. नारी भार बनकर न रहे
7. विभेद और विभाजन की दु:खद दीवारें
8. भाग्यवाद और ग्रहगोचर
9. विभेद और बिलगाव देर तक नहीं टिकेंगे
10. समझदार इतना तो समझें ही

Author Pt. Shriram Sharma Aacharya
Publication Yug Nirman Yojana Vistar trust, Mathura
Publisher Yug Nirman Yojana Press, Mathura
Page Length 56
Dimensions 12X18 cm
  • 09:42:AM
  • 29 Nov 2020




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