प्रत्यक्ष फलदायिनी साधनाएँ

Author: Pt. Shriram sharma

Web ID: 1191

`9 Add to cart

Availability: In stock

Condition: New

Brand: AWGP Store

Preface

मन और अंतःकरण के मिलन में, एकता में सुख है । इसी को आत्मा और परमात्मा का मिलन कहते हैं । इस मिलन का दूसरा नाम योग है । दो वस्तुओं के मिलने से एक नवीन तत्त्व उत्पन्न होता है । पति-पत्नी का मिलन एक मनोहर संतान का उपहार उपस्थित करता है । बिजली की ऋण शक्ति और धन (ठंढी और गरम) शक्ति के तार जब आपस में मिलते हैं तो एक नवीन शक्ति उत्पन्न होती है । आत्मा और परमात्मा के योग से एक ऐसे आनंद का आविर्भाव होता है, जिसकी तुलना संसार के अन्य किसी भी सुख से नहीं की जा सकती । इस सुख को परमानंद, जीवन-मुक्ति, ब्रह्मनिर्वाण, आत्मोपलब्धि, प्रभुदर्शन आदि नामों से पुकारा जाता है ।

यह योग-साधना जीवन का एक नित्य कर्म होना चाहिए । संसार के वातावरण का कुप्रभाव मन पर जमता है, इसको नित्य ही साफ करने की जरूरत पड़ती है । कमरे में नित्य धूलि जमती है, इसलिए नित्य झाडू लगानी पड़ती है, त्वचा पर, नाक-कान, आँख, दाँत, जीभ पर नित्य मैल जमता है, इसलिए उनको जल से नित्य स्वच्छ करते हैं । इसी प्रकार मन पर सांसारिक दुष्प्रवृत्तियों के कुसंस्कार नित्य जमते हैं, उनको हटाने के लिए नित्य योग-साधना की जरूरत पड़ती है । रोज जमने वाले मानसिक मैलों की सफाई के लिए और मन की आत्मविरोधी प्रवृत्तियों को हटाने के लिए योग-साधना आवश्यक है और इतनी आवश्यक है कि उसे स्नान, शौच, भोजन, शयन की ही भांति नित्य कर्मों में स्थान मिलना चाहिए ।

Table of content

1. आत्मजागरण योग
2. सम्यकत्व योग
3. आत्मनिरिक्षण योग
4. भूत साधना से आत्मविजय
5. उपवास साधना
6. आत्मनियंत्रण के लिए व्रत
7. सूर्य नमस्कार
8. प्राणाकर्षण प्रणायाम
9. क्रिया योग
10. मौन व्रत

Author Pt. Shriram sharma
Publication Yug Nirman Yogana, Mathura
Publisher Yug Nirman Yogana, Mathura
Page Length 48
Dimensions 12X18 cm
  • 09:58:PM
  • 17 Feb 2020




Write Your Review



Relative Products