सर्वतोमुखी उन्नति

Author: Pt shriram sharma acharya

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Preface

गायत्री मंत्र का चौदहवाँ अक्षर धी जीवन की सर्वतोमुखी उन्नति की शिक्षा देता है-

धीरस्तुष्टो भवेन्नैव ह्योकस्यां समुन्नतौ ।
कृयतामुन्नति स्तेन सर्वास्वाशस्तु जीवने ।

अर्थात- विज्ञ मनुष्य को एक ही प्रकार की उन्नति में संतुष्ट नहीं रहना चाहिए वरन् सभी दिशाओं में उन्नति करनी चाहिए ।

जैसे शरीर के सभी अंगों का पुष्ट होना आवश्यक होता है, वैसे ही जीवन के सभी विभागों में विकास होना वास्तविक उन्नति का लक्षण है ।

यदि हाथ खूब मजबूत हो जायें और पैर बिल्कुल दुबले-पतले बने रहे, तो यह विषमता बहुत बुरी जान पड़ेगी । इसी प्रकार कोई आदमी केवल धनी, केवल विद्वान, केवल पहलवान बन जाय तो यह उन्नति विशेष हितकारी नहीं समझी जा सकती । वह पहलवान किस काम का जो दाने- दाने को मुँहताज हो, वह विद्वान किस काम का जो रोगों से ग्रस्त हो, वह धनी किस काम का जिसके पास न विद्या है न स्वास्थ्य । वही मनुष्य सफल कहा जा सकता है जो अपने स्वास्थ्य को उत्तम बनावे, सुशिक्षा द्वारा बुद्धि का विकास करे, जीवन- निर्वाह के लिए आजीविका का उचित प्रबन्ध करे और समाज में प्रतिष्ठा तथा विश्वास का पात्र समझा जाय ।

Table of content

• उन्नति करना ही जीवन का मूल मंत्र है
• उन्नति के लिए आकांक्षा कीजिए
• उन्नति के मार्ग में कठिनाइयाँ
• उन्नति के लिए प्रयत्न और परिश्रम की आवश्यकता

Author Pt shriram sharma acharya
Edition 2015
Publication Yug Nirman Yojana Press
Publisher Yug Nirman Yojana Vistara Trust
Page Length 24
Dimensions 12 cm x 18 cm
  • 05:12:PM
  • 19 Jan 2020




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