सर्वोपयोगी गायत्री साधना

Author: Pt. Shriram Sharma Aacharya

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Preface

वेद कहते हैं ज्ञान को ।। ज्ञान के चार भेद हैं -ऋक्, यजुः, साम और अथर्व ।। कल्याण, प्रभुप्राप्ति, ईश्वर दिव्यत्व, आत्मशांति, ब्रह्म- निर्वाण, दर्शन, धर्मभावना, कर्तव्यपालन, प्रेम, तप, दया, उपकार, उदारता, सेवा आदि "ऋक्" के अंतर्गत आते हैं ।। पराक्रम- पुरुषार्थ, साहस- वीरता, रक्षा- आक्रमण, नेतृत्व- यश, विजय, पद, प्रतिष्ठा ये सब "यजु" के अंतर्गत हैं ।। क्रीड़ा- विनोद, मनोरंजन, संगीत, कला, साहित्य, स्पर्श, इंद्रियों के स्थूल भोग तथा उन भोगों का चिंतन, प्रिय कल्पना, खेल, गतिशीलता, रुचि, तृप्ति आदि को "साम" के अंतर्गत लिया जाता है ।। धन- वैभव, वस्तुओं का संग्रह, शास्त्र, औषधि, अन्न, वस्त्र, धातु गृह, वाहन आदि सुख- साधनों की सामग्रियाँ "अथर्व" की परिधि में आती हैं ।।

किसी भी जीवित प्राणधारी को लीजिए उसकी सूक्ष्म और स्थूल, बाहरी- भीतरी क्रियाओं और कल्पनाओं का गंभीर एवं वैज्ञानिक विश्लेषण कीजिए प्रतीत होगा कि इन्हीं चार क्षेत्रों के अंतर्गत उसकी समस्त चेतना परिभ्रमण कर रही है ।। (१) ऋक्- कल्याण (२) यजु- पौरुष (३) साम- क्रीड़ा (४) अथर्व- अर्थ इन चार दिशाओं के अतिरिक्त प्राणियों की ज्ञान- धारा और किसी ओर प्रवाहित नहीं ।।

Table of content

1. वेदमाता गायत्री का स्वरूप
2. शक्ति का अद्भुत स्रोत
3. सर्वसम्मत, सर्वश्रेष्ठ साधना
4. गायत्री का अधिकार
5. गायत्री-साधना का उद्देश्य
6. उपासना की मर्यादाएँ
7. षट्कर्म व्याख्या
8. जप से चेतना का परिष्कार
9. आत्म जागरण के लिए ध्यानयोग
10. शक्ति के भंडार “अनुष्ठान”

Author Pt. Shriram Sharma Aacharya
Publication Yug Nirman Yojana Vistar trust, Mathura
Publisher Yug Nirman Yojana Press, Mathura
Page Length 124
Dimensions 12 X 18
  • 09:16:PM
  • 5 Jun 2020




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