साधना में प्राण आ जाये तो कमाल हो जाय

Author: Pt. Shriram Sharma Aaachrya

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Preface

मित्रो! जीवित और मृतक व्यक्ति के बीच का अंतर आपको मालूम है । जीवित और मृतक व्यक्ति के नाम और रूप वही रहते हैं । शक्ल को आप देख लीजिए वही शक्ल है । पिता जी की मृत्यु हो गई है, हम भी उनके दर्शन करने के लिए आए हैं । अच्छा! तो देख लीजिए ये वही हैं न? हाँ वही हैं । मित्रो! मरे हुए पिता जी के अंदर एक और विशेषता पाई जाएगी । उनके अंदर हलचल नहीं होती । जीवित आदमी का दिल धड़कता रहता है, साँस चलती रहती है । फिर भी आप यह मत सोचें कि मरने के बाद में आदमी की हलचलें बंद हो जाती हैं । हलचलें बंद नहीं होतीं । आदमी के भीतर क्या हलचलें शुरू हो जाती हैं ? धड़कन के स्थान पर एक नई प्रक्रिया शुरू हो जाती है और उसका नाम है- सड़न । सड़न की एक्टीविटीज बहुत तीव्र गति से चालू हो जाती है, जिस तरीके से हमारा रक्त चलता है, साँसें चलती हैं, उससे भी ज्यादा सड़न की एक्टीविटीज बन जाती है । आदमी का नाम और रूप वही है, लेकिन अब वह कुछ काम नहीं कर सकता ।

Table of content

1. चेतना की शक्ति
2. प्राण प्रतिष्ठा का महत्व
3. जीवंतता का संचार
4. कर्मकांडों में प्राण आ जाय
5. पञ्च कोष हैं पञ्चदेव
6. साधना का मर्म
7. जीवन देवता की साधना क्यों नहीं की
8. अध्यात्म की परिभाषा
9. अपनी पात्रता विक्सित कर लें पहले
10. शिष्य हैं अब कहाँ
11. गुर को पाकर हम निहाल
12. शोध की सफलता गुरु के मार्गदर्शन के कारण

Author Pt. Shriram Sharma Aaachrya
Publication Yug Nirman Yojana trust, Mathura
Publisher Yug Nirman Yojana Press, Mathura
Page Length 32
Dimensions 12 X 18 cm
  • 09:56:PM
  • 17 Feb 2020




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