श्रम है सुख का सेतु

Author: Pt. Shriram Sharma Acharya

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Preface

मानव- जीवन का सबसे बड़ा आधार श्रम ही है ।। हमारी सबसे प्रधान आवश्यकताओं- भोजन, वस्त्र, निवास स्थान की पूर्ति किसी न किसी के श्रम द्वारा ही होती है ।। अन्न के मिल जाने पर उसको खाने के लायक रोटी के रूप में परिवर्तित करने में भी श्रम करना पड़ता है और बिना श्रम के वह ठीक तौर से हजम होकर शरीर में रस- रक्त के रूप में बदल भी नहीं सकती ।। यह सब देखते हुए भी मनुष्य श्रम से बचने की चेष्टा करते रहते है ।। इसके लिए वे अपना कार्य- भार दूसरों पर लादने की कोशिश ही नहीं करते, वरन् तरह- तरह के आविष्कार करके, यंत्र बनाकर भी अपने हाथ- पैरों का कार्य उनसे पूरा कराने का प्रयत्न करते हैं ।। परिणाम यह होता है कि चाहे मनुष्य की दिमागी शक्तियाँ बढ़ रही हों, पर शारीरिक शक्तियाँ क्षीण होती जाती है और उसका जीवन कृत्रिम तथा परावलम्बी होता चला जाता है ।। चाहे नकली बातों को महत्व देने वाले और विचारशून्य इन बातों में भी गौरव और शान समझते हों पर जीवन- संघर्ष में इसके कारण विपत्तियाँ ही सहन करनी पड़ती है ।। इस सम्बन्ध में एक लेखक ने बहुत ठीक कहा है -

"पता नहीं कहाँ से यह गलत ख्याल लोगों में आ गया है कि परिश्रम से बचने में कोई सुख नहीं है ।। परिश्रम करने से कुछ थकावट आती है, पर श्रम न करने से तो शक्ति का स्रोत ही सूख जाता है ।। मेरी समझ से तो बेकार रहने से अधिक " श्रमसाध्य " और कोई काम नहीं है ।। कुछ काम न करना मानो जीते जी मर जाना है ।"

Table of content

1. श्रम स्वयं एक वरदान
2. श्रम से बचने की हानिकारक प्रवृत्ति
3. ईश्वरीय नियमों का पालन कीजिये
4. धन का अनुक्षित महत्ता
5. श्रेष्ठता का झुठा भ्रम
6. प्रगति का अमोघ साधन-श्रम
7. श्रम का कल्याणकारी सिद्धान्त
8. श्रम का सम्मान कीजिये
9. श्रम से ही जीवन निखरता है


Author Pt. Shriram Sharma Acharya
Edition 2015
Publication Yug nirman yojana press
Publisher Yug Nirman Yojana Vistar Trust
Page Length 32
Dimensions 12 cm x 18 cm
  • 05:21:AM
  • 23 Jan 2020




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