पतिव्रत की महिमा, पत्निव्रत की गरिमा

Author: Pt. Shriram Sharma Aacharya

Web ID: 985

`7 Add to cart

Availability: In stock

Condition: New

Brand: AWGP Store

Preface

पुरुषों की अपेक्षा गृहिणी नारी के पास अवकाश की कमी रहती है। रोजगार संबंधी काम कर चुकने के बाद पुरुष वर्ग के पास काफी समय बच जाता है, जिसमें वह आत्म- कल्याण का कोई कार्यक्रम आसानी से चला सकता है ।। नारी के पास समय की कमी रहती है ।। प्रात: उठते ही वह गृहस्थी के काम - धंधों में लग जाती है ।। जिस समय पुरुष वर्ग अपने काम पर गया होता है, नारी घर के किसी न किसी काम में लगी रहती है ।। वह काम घर की सफाई व्यवस्था से लेकर कपड़े सीना, राशन, मसाले तथा अन्य चीजों का रखना, उठाना, सुखाना, बनाना, बीनना न जाने कितने तरह के काम उनके पीछे लगे रहते हैं ।। इन सबके ऊपर संतान पालन, उसकी देख- रेख तथा साज- सँभाल का इतना बड़ा काम उसके पास रहता है कि उससे किसी समय अवकाश नहीं मिलता ।। बच्चे हर समय माँ से लिपटते रहते है ।। यही कारण है कि उसे आत्म- कल्याण की कोई योजना चलाने के लिए अवकाश वांछित तथा आवश्यक है ।।

अतएव नारी की इस व्यस्तता को देखते हुए भारतीय मनीषियों ने नारी के लिए आत्म- कल्याण का एक सरल सा उपाय खोज दिया है ।। वह है पतिव्रत धर्म का निर्वाह ।। पतिव्रता नारी वह सद्गति सहज ही में प्राप्त कर लेती है जो योगी- यती, ज्ञानी- ध्यानी बड़ी कठिनाई से साधना करने के बाद पाते है ।। पतिव्रत धर्म नारियों के लिए बड़ा सरल तथा हितकारी धर्म है ।।

Table of content

1. पतिव्रत एक योग साधना
2. शक्ति का स्रोत-पतिव्रत
3. पतिव्रत ही नहीं पत्नी व्रत भी
4. पति-पत्नी का समान धर्म-कर्तव्य
5. रामायण का आदर्श न पति भूले न पत्नी
6. धर्मपत्नी के प्रति पति के कर्त्तव्य

Author Pt. Shriram Sharma Aacharya
Edition 2015
Publication Yug nirman yojana press
Publisher Yug Nirman Yojana Vistar Trust
Page Length 40
Dimensions 12 cm x 18 cm
  • 07:41:AM
  • 29 Mar 2020




Write Your Review



Relative Products