प्रज्ञावतार का स्वरूप एवं क्रिया-कलाप

Author: Pt. Shriram Sharma Aacharya

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Preface

उत्थान और पतन सृष्टि-प्रवाह के उलटते - पलटते पृष्ठ हैं । यद्यपि इसमें प्रधानता सृजन की ही है, पर बीच-बीच में पतन और पराभव का सामना भी करना पड़ता है । विश्व के इतिहास में ऐसी घड़ियाँ अनेक बार आई हैं, जब विनाश का तांडव अपनी पूरी गति से नृत्य करता रहा है । उस समय जन-जन सर्वनाश की आशंका से काँप रहा था । पर स्नष्टा अपनी कृति को इतने सहज में प्रलय के मुख में नहीं जाने दे सकता । यह समय एक चमत्कार जैसा होता है जिससे नाश के गर्त में गिरता हुआ संसार-गति में जरा सा परिवर्तन हो जाने से बच जाता है । उसी को दैव की अवतार-लीला कहा जाता है ।

Table of content

1. प्रज्ञावतार का स्वरूप और क्रिया-कलाप
2. वर्तमान युग की विभीषिका
3. विभीषिकाओं का उपचार-प्रज्ञावतार
4. प्रज्ञावतार का स्वरूप और कार्यपद्धति
5. जाग्रत आत्माओं की भूमिका

Author Pt. Shriram Sharma Aacharya
Edition 2014
Publication Yug Nirman Yojna Trust, Mathura
Publisher Yug Nirman Yojna Trust
Page Length 56
Dimensions 12 X 18 cm
  • 09:15:AM
  • 1 Apr 2020




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