संस्कृतिक चेतना के उन्नायक-45

Author: Pt. Shriram Sharma Aacharya

Web ID: 382

`150 Add to cart

Availability: In stock

Condition: New

Brand: AWGP Store

Preface

वाड्मय के विगत खंडों की तरह इस खंड में संस्कृति की रक्षा-मानव मात्र की मुक्ति के लिए प्रयास-पुरुषार्थ करने वाले महापुरुषों-अवतारी सत्ताओं के जीवनवृत्त दिए गए हैं । इसमें धर्मोद्धारक एवं संस्कृति-रक्षक भी हैं तो ज्ञान-क्रांति के प्रणेता भी एवं सेवा-साधना द्वारा विश्व-वसुधा के लिए ही जीकर समाज-संस्कृति-विज्ञानजगत से लेकर अपने राष्ट्रों के लिए कुछ कर गुजरने वालों के विवरण पूज्यवर की लेखनी से लिखे गए हैं । सामान्य से परे असामान्य स्तर का जीवन जीने वाले इन महापुरुषों के कारण ही धरित्री पर संस्कृति-सभ्यता एवं धर्म का कलेवर जिंदा है ।

मानवीय चिंतन का सहज स्वभाव अधोगामी होता है । वृत्ति पतनोन्मुख ही रहती है । बहिरंग का आकर्षण ही मानवी प्रकृति को भाता है किंतु उस चिंतन की धारा को ऊर्ध्वमुखी बनाने का कार्य ऐसी लीला गाथाओं से होता है जो इस खंड में वर्णित हैं । भले ही आज वे सभी महापुरुष हमारे बीच नहीं, किंतु उनके सत्कार्यों के वर्णन को पढ़कर हम उनके वैचारिक सत्संग का सहज ही लाभ ले सकते हैं । स्वाध्याय परंपरा के अंतर्गत महापुरुषों-लीलावतारों के जीवनवृत्तांतों को इसीलिए बार-बार पढ़ा जाता है, ताकि मस्तिष्कपटल पर उनकी छाप पड़ती चली जाए एवं क्रमश: वही चित्त की वृत्ति व स्वभाव भी बन जाए अंतत: संस्कार में परिणत हो जाए ।

महात्मा बुद्ध सिद्धार्थ के रूप में राजा थे व तीर्थंकर महावीर स्वामी भी राजघराने के सर्वेसर्वा । किंतु दोनों ने ही मानव मात्र की मुक्ति के लिए अपने वैभव को ठोकर मार दी एवं गहन तप-तितिक्षा का मार्ग अपनाकर सबकी मुक्ति का मार्ग खोजा । दोनों क्रमश: बौद्ध धर्म व जैन धर्म संप्रदाय के प्रणेता कहलाए ।

Table of content

अध्याय-१
धर्मोद्वारक और संस्कृति संरक्षक
अध्याय-२
ज्ञान - क्रांति के अग्रदूत
अध्याय-३
सेवा धर्म के सच्चे उपासक

Author Pt. Shriram Sharma Aacharya
Dimensions 20 cm x 27 cm
  • 09:04:AM
  • 29 Mar 2020




Write Your Review



Relative Products