आपत्तियों में धैर्य

Author: Pt. Shriram Sharma Aacharya

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Preface

गायत्री का पाँचवाँ अक्षर "तु" आपत्तियों और कठिनाइयों में धैर्य रखने की शिक्षा देता है-

तु तृषाराणां प्रपातेऽपि यत्नों धर्मस्तु चात्मन: ।
महिमा च प्रतिष्ठा च प्रोक्ता परिश्रमस्यहि ।।

अर्थात- "आपत्तिग्रस्त होने पर भी प्रयत्न करना आत्मा का धर्म
है । प्रयत्न की महिमा और प्रतिष्ठा अपार कही गई है ।"

मनुष्य के जीवन में विपत्तियाँ कठिनाईयाँ, विपरीत परिस्थितियाँ हानियाँ और कष्ट की घड़ियाँ आती ही रहती हैं । जैसे कालचक्र के दो पहलू - काल और दिन हैं, वैसे ही संपदा और विपदा, सुख और दुःख भी जीवन रथ के दो पहिये हैं । दोनों के लिए ही मनुष्य को निस्पृह वृत्ति से तैयार रहना चाहिए । आपत्ति में छाती पीटना और संपत्ति में इतराकर तिरछा चलना, दोनों ही अनुचित हैं ।

आशाओं पर तुषारपात होने की, निराशा, चिंता, भय और घबराहट उत्पन्न करने वाली स्थिति पर भी मनुष्य को अपना मस्तिष्क असंतुलित नहीं होने देना चाहिए । धैर्य को स्थिर रखते हुए सजगता, बुद्धिमत्ता, शांति और दूरदर्शिता के साथ कठिनाइयों को मिटाने का प्रयत्न करना चाहिए । जो कठिन समय में भी हँसता रहता है, जो नाटक के पात्रों की तरह जीवन के खेल को खेलता है उसी की बुद्धि स्थिर मानी जा सकती है ।

Table of content

1. आपत्तियों से डरना व्यर्थ है ?
2. कठिनाइयों द्वारा आध्यात्मिक विकास
3. मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयो:
4. कठिनाईयाँ हमारी उन्नति में सहायक होती हैं
5. धैर्य एक महत्त्वपूर्ण गुण है ?
6. प्रत्येक परिस्थिति में आगे बढ़िए
7. आपत्तियों से चिंतित न हों
8. आपत्ति निवारण के कुछ स्वर्णिम सूत्र


Author Pt. Shriram Sharma Aacharya
Edition 2015
Publication Yug nirman yojana press
Publisher Yug Nirman Yojana Vistar Trust
Page Length 24
Dimensions 12 cm x 18 cm


Reviews of - Apattiyon Mei Dhairya


pragya
20/09/2017


आपत्तियों में धैर्य

Nice book .....



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