आत्म ज्ञान और आत्म कल्याण

Author: Pt. shriram sharma

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Preface

गायत्री का तेईसवाँ अक्षर द हमको आत्मज्ञान और आत्म कल्याण का मार्ग दिखलाता है-
दर्शन आत्मन: कृत्या जानीयादात्म गौरवम् ।
ज्ञात्या तु तत्तदात्मानं पूर्णोन्नति पर्थ नयेत् । ।

आत्मा को देखे, आत्मा को जाने, उसके गौरव को पहचाने और आत्मोन्नति के मार्ग पर चले ।

मनुष्य महान पिता का सबसे प्रिय पुत्र है । सृष्टि का मुकुटमणि होने के कारण उसका गौरव और उत्तरदायित्व भी महान है । यह महत्ता उसके दुर्बल शरीर के कारण नहीं, वरन आत्मिक विशेषताओं के कारण है ।

आत्मगौरव की रक्षा करना मनुष्य का परम कर्त्तव्य है । जिससे आत्म- गौरव घटता हो, आत्मग्लानि होती हो, आत्महनन करना पड़ता हो, ऐसे धन, सुख, भोग और पद को लेने की अपेक्षा भूखा, नंगा रहना ही अच्छा है । जिसके पास आत्मधन है उसी को सच्चा धनी समझना चाहिए । जिसका आत्मगौरव सुरक्षित है, वह इंद्र के समान बड़ा पदवीधारी है, भले ही चाँदी और ताँबे के टुकड़े उसके पास, कम मात्रा में ही क्यों न हों ?

Table of content

1. आत्मनिर्माण का मार्ग
2. आत्मोन्नति के लिए आवश्यक गुण
3. आध्यात्मिक मार्ग में सफलता कैसे प्राप्त हो सकती है ?
4. आत्मकल्याण और सदुपदेश
5. आत्मकल्याण के लिए आत्मनिरीक्षण की आवश्यकता
6. आत्मकल्याण और मानसिक शक्तियाँ
7. आत्मज्ञान ही सबसे बड़ी संपदा है

Author Pt. shriram sharma
Edition 2015
Publication yug nirman yojana press
Publisher Yug Nirman Yojana Vistara Trust
Page Length 24
Dimensions 12 cm x 18 cm




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