धर्म की सुदृढ़ धारणा

Author: Pt. shriram sharma

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Preface

गायत्री का अठारहवां अक्षर यो धर्म मार्ग पर स्थिर रहने का आदेश देता है-

यो धर्मा जगदाधार: स्वाचरणो तमानय,
मा विडम्वय तं स ते ह्योकामार्गे सहायक।

अर्थात् -जो धर्म संसार का आसार है उस मार्ग पर आचरण करो ।
उसकी विडम्बना मत करो । धर्म ही तुम्हारा एक मात्र सहायक है ।

धर्म ही संसार का आधार है । उसके ऊपर विश्व का समस्त भार
रखा है । यदि धर्माचरण उठ जाय तो सबको अपने प्राण बचाने और
दूसरों को कुचलने की चिंता में निश-दिन डूबा रहना पड़ेगा और कोई
भी चैन से न बैठ सकेगा ।

दुष्ट लोग भी धर्म की आड़ में लाभ उठाने ठगी का जाल फैलाने
की चेष्टा करते हैं । इससे मालूम होता है कि धर्म ही ऐसी मजबूत चीज
है जिसका आश्रय लेकर बुरे मनुष्य भी अपना काम चलाना चाहते है ।
मनुष्य को ऐसे सुदृढ़ आधार पर ही जीवन की इमारत का निर्माण करना
चाहिए ।

दान-पुण्य धार्मिक कर्मकाण्ड, पूजा-पाठ आदि तो धर्म का एक
साधन मात्र हैं । वास्तविक धर्म तो कर्तव्य पालन दूसरों की सेवा
परोपकार सच्चाई और संयम में है । इन्हें विचार और कार्यों में भली
प्रकार स्थान देने वाला ही वास्तव में धर्मात्मा माना जा सकता है ।

Table of content

1. धर्म का मूल तत्व
2. धर्म और सामूहिकता की भावना
3. धर्मात्मा के लक्षण
4. धर्म के हो स्वरूप
5. धर्म का व्यापक स्वरूप

Author Pt. shriram sharma
Edition 2015
Publication yug nirman yojana press
Publisher Yug Nirman Yojana Vistara Trust
Page Length 24
Dimensions 12 cm x 18 cm




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