न्याय एवं वैशेषिक दर्शन

Author: Pandit Shriram Sharma Aacharya

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Preface

मानव जीवन का लक्ष्य एवं सांसारिक स्थिति की विवेचना अनुभवों के आधार पर करनेवाला न्यायदर्शन, वस्तुवाद का पोषक है । इसके अनुसार जीवन का परम लक्ष्य मोक्ष है, जिसकेद्वारा दुःखों की पूर्णत: निवृत्ति हो जाती है । न्यायके मतानुसार जीवात्मा कर्त्ता एवं भोक्ता होने के साथ-साथ, ज्ञानादि से सम्पन्न नित्य तत्त्व है । यह जहाँ वस्तुवाद को मान्यता देता है, वहीं यथार्थ वादका भी पूरी तरह अनुगमन करता है । मानव जीवन में सुखों की प्राप्ति का उतना अधिक महत्त्व नहींहै, जितना कि दुःखों की निवृत्ति का । ज्ञानवान् होया अज्ञानी, हर छोटा-बड़ा व्यक्ति सदैव सुख प्राप्तिका प्रयत्न करता ही रहता है । सभी चाहते हैं कि उन्हें सदा सुख ही मिले, कभी दुःखों का सामनान करना पड़े, उनकी समस्त अभिलाषायें पूर्णहोती रहें; परन्तु ऐसा होता नहीं । अपने आप को पूर्णत: सुखी कदाचित् ही कोई अनुभव करता हो । जिनको भरपेट भोजन, तन ढकने के लिए पर्याप्त वस्त्र तथा रहने के लिए मकान भी ठीक से उपलब्ध नहीं तथा जो दिन भर रोजी-रोटी के लिए मारे-मारे फिरते हैं, उनकी कौन कहे; जिनके पास पर्याप्त धन-साधन, श्रेय-सम्मान सब कुछ है, वेभी अपने दुःखों का रोना रोते देखे जाते हैं । आखिरऐसा क्यों है? क्या कारण है कि मनुष्य चाहता तो सुख है; किन्तु मिलता उसे दुःख है । सुख-सन्तोषके लिए निरन्तर प्रयत्नशील रहते हुए भी वह अनेकानेक दुःखों एवं अभावों को प्राप्त होता रहताहै । आज की वैज्ञानिक समुन्नति से, पहले की अपेक्षा कई गुना सुख के साधनों में बढोत्तरी होने
Author Pandit Shriram Sharma Aacharya
Edition 2010
Publication Yug Nirman Yogana, Mathura
Publisher Yug Nirman Yogana, Mathura
Page Length 400
Dimensions 246mm X183mm X 21mm




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