बाल संस्कारशालाएँ इस तरह चलें

Author: Pt Shriram sharma acharya

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Preface

संवेदनशील- अनुकरणीय आयु

बचपन सीखने की सबसे बड़ी अवधि है ।। उस अवधि में अचेतन इतना अधिक सचेतन होता है कि जो कुछ ग्रहण कर लेता है उसे आजीवन अपनाए रहता है ।। बच्चों की प्रत्यक्ष समझ तो कमजोर होती है पर उनकी सूक्ष्म ग्रहण- शक्ति इतनी अधिक होती है कि उसे आधारशिला कहा जाए तो कुछ अत्युक्ति न होगी ।।

दस वर्ष तक बालकपन माना गया है और इसके बाद के दस वर्ष तक का बालक बीस वर्ष की आयु तक का किशोर होता है ।। यही आयु है, जिसमें अभिभावकों की, संबंधी हितैषियों की सबसे बड़ी जिम्मेदारी है ।। बीस वर्ष में प्राय: मनुष्य समझदार हो जाता है, अपना भला- बुरा समझने लगता है और अपनी बुद्धि के सहारे अपने भले- बुरे का निर्णय कर सकता है ।। यों इस आयु में भी श्रेष्ठ- सज्जनों की संगति की आवश्यकता रहती है ।।

दस वर्ष तक के गुण, कर्म, स्वभाव का निर्माण अभिभावक और परिवार के लोग करते हैं ।। दस वर्ष तक बच्चा प्राय: माता- पिता और अभिभावकों के बीच रहता है ।। स्कूल पढ़ने जाता है तो वहाँ सभी अजनबी होते हैं ।। ज्यादातर समय उसे घर- परिवार में ही व्यतीत करना पड़ता है ।। उस समय में वह जो कुछ सीखता- समझता है, परिवार के लोग ही उसके वास्तविक शिक्षक होते हैं ।।

Table of content

• संवेदनशील-अनुकरणीय आयु
• जीवन चर्या की सहज शिक्षा
• शिष्टाचार का अभ्यास
• तनावमुक्त सहज शिक्षा
• उभरते जोश का सुनियोजन
• संयुक्त प्रयास जरूरी
• आदर्श वातावरण वाली संस्कारशालाएं
• झिझक हटे स्फूर्ति जागे
• पाठ्योत्तर शिक्षण भी आवश्यक
• सृजनात्मक वृत्ति और अभ्यास
• सहज दोषों से बचाव
• श्रेष्ठ सेवा आदर्श मनोरंजन
• महती आवश्यकता

Author Pt Shriram sharma acharya
Edition 2015
Publication Yug nirman yojana press
Publisher Yug Nirman Yojana Vistara Trust
Page Length 24
Dimensions 120X181X1 mm




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